पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)
Padmavat with Hindi Commentary
मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपद्मावत । २५५ उपजी आग आग जस बोई । अब मतैं छीन आननहिं होई ॥ भा त्योहार जो चांचर जोरी । खेल फाग अब लाई होरी ॥ समन्द फागमेलैं शिर धूरी । कीन्ह जो शाकाँ चाही पूरी ॥ चन्दन अगर मलयगिरि काढ़ा । घर घर कीन्ह सरौ रच ठाढ़ा ॥ जून्हरें कहँ साजा रनवासू । जेहिंसतहियें कहां तेहिआंसू ॥ दो० पुरुषन खड्गँ सँवारी चन्दन खौरीं देह । मेहरिनि सेंदुर मेला चहहिं भई जर खेहँ ॥ आठ वरष गढ़ छेंका रहा । धन सुलतान कि राजामहा ॥ आय शाह अँवरेंउँ जोलाई । फरे झरे पै गढ़ नहिं पाई ॥ हठ जोरी तब जून्हर होई । पद्मिनी पावन मिन्नतें सोई ॥ यहि बिधि ढील दीन्ह तबताई । देहली की अरदाँसैं आई ॥ पछम हरवें दीन्ह जो पीठी । सो अब चढ़ा सौंहैं कैदीठी ॥ जेहिमुइँमाथगगनें शिरलागा । थाने उठे आवसब भागा ॥ वहां शाँहँ चितोरगढ़ छावा । यहां देश अब भयो परावा ॥ दो० परत दृष्टि जेहि पंथै में, बाढ़ा वेर बबूर । निशि अँधियारीजायतब, वेगैं उठै जो सूरै ॥ सुनाशाह अरदासँ जो पढ़ी । चिन्ता आन आनचिंतचढ़ी ॥ तब आगो मन चीते कोई । जो आपन चेता कुछ होई ॥ मन झूठा जिव हाथ पराई । चिन्ता एक भई दुइ ठाई ॥ गढ़ सो उरझ जाय तब छूटा । होय मिलाव कि सोगढ़ टूटा ॥ डरपोक १ फागखेलों २ बहादुरी ३ चिता ४ मौत ५ दिल ६ मर्दों ने तलवारली ७ औरत ८ खाक ९ चारा १० शाह समझा कि वे मरे ११ मुश- किल १२ अरज़ी १३नाममुलुक १४ सामने १५ आसमान १६ अलाउद्दीन १७ निगाह १८ राह १६ रात २० जल्द २१ सूर्य २२ अरज़दास्त २३ ॥