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पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

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पृष्ठ 266

पद्मावत । २६५ फरे खजीजाँ दाड़िमें दाखौँ। जो वहं पंथै जाय सो चांखा ॥ कनकैकै छत्र सिंहासन साजा। पैठत पँवरें मिला लै राजा ॥ चढ़ाशाह चढ़ चितौर देखा। सब संसार पाँयँतर लेखा ॥ दो० देखा शाह गगनैं गढ़, इन्द्रलोक के साज। कहीराज फिरताकर, स्वर्ग करें जो राज ॥ चढ़ गढ़ ऊपर सङ्गत देखी। इन्द्रपुरी सो जान बिशेखी ॥ ताल तलावा सरवरें भरे। औअम्बरोंउँ चहुँदिशिफरे ॥ कुवां बावरी भांतिहि भांती। मढ़मएडप तहँतहँ बहुँपांती ॥ रॉयैं राग घरघर सुख चाऊ। कनकैमँदिरनगकीन्हजड़ाऊ॥ निशिनँ दिनबाजहिंमन्दिरतूरैं। रहसकूद सब लोग सेंदूरैं ॥ रतनैं पदारथ नग जो बखाने। घूरन महँ देखे अहिरानें ॥ मँदिर मँदिर फुलवारी बारी। बारबोरै तहँ चित्रैं सँवारी ॥ दो० पांसासोरैंकुँवरसबखेलांहिं, श्रवनैंहींगीतउनाहिं। चैन चाउ तस देखा, जनु गढ़ छेका नाहिं ॥ देखत शाह कीन्ह तहँ फेरा। जहाँ मंदिर पद्मावत केरा ॥ आसपास सरवरं चहुँ पासा। मँदिरमाँझेजनुलागअकासा॥ कनकैकै सँवार नगहिंसबजरा। गगनैंचन्द जनु नखतहिंभरा॥ सरवरैं चहुँदिशि पुरइनफूली। देखा बौंरि रहा मन भूली ॥ कुँवरिलाख दुइवार अँगौरे। दुहुँदिशि पँवरैं ठाढ़ करैंज़ोरे ॥ शारदूलैं दुहुँ दिशि गढ़काढें। कलकँजँहि जानहुँ रिसठाढ़े ॥ जानवन्त लिये चित्रैं कटाऊ। वहँतकपँवैरै सोलागजड़ाऊ ॥ नाममेवा १ अनार २ अंगूर ३ राह ४ सोना ५-१२-२२ दरवाज़ा ६- १६-२५-२७-३२ आसमान ७-८-२३ तालाब ९-२०-२४ बगीचा १० अमीरउमरा ११ रात १३ नामवाज़ा १४ जवाहिरात १५ तसवीर १७-३१ चौसर १८ मकान १६ चीज २१ पेशवाई २६ हाथ२८लाल शेर २६ डकारना ३०॥