पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 106, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें८८ पञ्चदशी 'ईश्वर' वा 'जीव' कहा जाता है, वह आगे कही दो उपाधियों से कल्पित किया हुआ होता है [ कल्पित होने से ही ये जीवे- श्वर भी उस ब्रह्म के परिच्छेदक नहीं बन सकते हैं ] शक्तिरस्त्यैश्वरी काचित् सर्ववस्तुनियामिका । आनन्दमयमारभ्य गूढा सर्वेषु वस्तुषु ॥३८॥ ऐश्वरी अर्थात् ईश्वर से सम्बन्ध रखने वाली [ ईश्वर की उपाधि बनी हुई] कोई एक ऐसी शक्ति है [जिसका सत् या असत् किसी भी रूप से निर्वचन नहीं हो सकता] जो [पृथिवी आदि] सम्पूर्ण नियम्य वस्तुओं को नियम में रख रही है। वह शक्ति आनन्दमय से लेकर [ब्रह्माण्ड पर्यन्त] सभी वस्तुओं में गूढ भाव से छिपी बैठी है [यही कारण है कि वह दीख नहीं पड़ रही है]। वस्तुधर्मा नियम्येरन् शक्त्या नैव यदा तदा । अन्योऽन्यधर्मसांकर्याद् विप्लवेत जगत् खलु ॥३९॥ यदि यह शक्ति, पृथिवी आदि वस्तुओं के [काठिन्य द्रवत्व आदि ] धर्मों को नियम में न रखती होती तो अन्योऽन्य धर्म की संकरता किंवा मिश्रण हो जाने से [ किसी एक जगह नियत भाव से न रहने से ] जगत् में विप्लव मच जाता । चिच्छायावेशतः शक्तिश्चेतनेव विभाति सा। तच्छक्त्युपाधिसंयोगाद् ब्रह्मैवेश्वरतां व्रजेत् ॥४०॥ चिच्छायावेश [ किंवा चिदाभासके प्रवेश ] से यह शक्ति चेतन सी प्रतीत हुआ करती है [ इसी से वह नियामक हो सकती है ] उस शक्ति रूपी उपाधि के सम्बन्ध से [ सत्यादि रूप ] ब्रह्म ही ईश्वरभाव को प्राप्त हो जाता है [किंवा सर्वज्ञत्व आदि धर्मों से युक्त हो जाता है ]।