पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( झ ) की आहुति दे देनी पड़ जाय। ये प्रलय तक के प्रबन्ध करते हैं, मानो यहां से कभी जाना ही नहीं है। ये अगले संसार के अस्तित्व को निर्भीकता से निषेध करते हैं। सैकड़ों आशाओं से वद्ध होकर और काम क्रोध के दास होकर कामभोग के लिये अन्यायपूर्वक धनोपार्जन करने में थोड़ा सा भी संकोच इनको नहीं होता। इनकी दृष्टि में इनसे बड़ा कुलीन, बुद्धिमान, बलवान् कोई दूसरा होता ही नहीं। दूसरों की प्रतिष्ठा का तो ये कुछ भी मूल्य समझते ही नहीं। ऐसे जीवन में बस एक ही काम रह जाता है कि अपनी बेसमझी से प्रेरित होकर पहले तो कुछ इच्छा कर ली और पीछे उस इच्छा को पूरी करने में प्राणों तक की बाजी लगा बैठे और इच्छित विषय मिल गया तो उसे भोगने लगे। संक्षेप में ऐसों का जीवन कामोपभोगतत्पर जीवन बन जाता है। किसी भी भ्रान्त इच्छा के दास बन जाना और उसके पीछे सैकड़ों उपद्रव खड़े कर देना बस इसी बात में इनके अनन्त आयुष्य समाप्त हो जाते हैं। इनकी इस प्रवृत्ति का पूरा पूरा दुष्परिणाम जब तक नहीं निकल आता और जब तक कि अन्दर से इस प्रवृत्ति की अस्वीकृति नहीं आजाती, तब तक यह आसुरी प्रवृत्ति बढ़ती ही जाती है। इसके विपरीत जब तो जीवन तत्व की सर्वव्यापकता समझ में आती है—जब जीवन तत्व का शरीर मात्र में सीमित होना किसी तरह समझ में आता ही नहीं—तब मनुष्य में स्वभाव से दैवी गुणों का प्रवेश होने लगता है। फिर किसी से भय नहीं लगता । संसार के रहस्य पर दृष्टि जम जाती है। अब वह क्षुद्र अहं का दास न रह कर पूर्ण अहं का उपासक बन जाता है। व्यापक जगदात्मा का मैं भी एक क्षुद्र अवयव हूँ इस भाव से प्रभावित होकर व्यापक जगदात्मा की सेवा के भाव से—उसको प्रसन्न करके इस का दर्शन लेने की भावना से—दूसरों की सहायता करता है। क्षुद्र अहं में बांध रखने वाली इन्द्रियों को तो दम की भारी बेड़ी में बांध कर रख देता है। जो काम करता है