पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंयमिदंरूप इति' [बृ० १-४-७] इस प्रकरण में वाजसनेयियों ने यह कहा है कि यह जगत् पहले अव्याकृत था अब [उस में केवल उतना ही परिवर्तन और हुआ है कि] वह दृश्य नाम तथा दृश्य रूप से व्याकृत होगया है। वे नाम और रूप विराद् आदि स्थूल कार्यों में स्पष्ट ही दीखते हैं। विराद्, मनु, मनुष्य, गाय, गधा, घोड़ा, बकरी, भेड़ तथा पिपीलिका पर्यन्त जितने भी मिथुन [जोड़े-दम्पति] हैं वे सब विराडादि कहे जाते हैं। कृत्वा रूपान्तरं जैवं देहे प्राविशदीश्वरः। इति ताः श्रुतयः प्राहु र्जीवत्वं प्राणधारणात् ॥१०॥ उन्हीं श्रुतियों ने यह बात भी कही है कि वही ईश्वर अपना रूपान्तर कर के अर्थात् जीव रूप को धारण कर के देहों में प्रवेश कर गया है अर्थात् जीव बन गया है। प्राणों को धारण करने किंवा स्वामी होकर उन का प्रेरक होने से ही जीवभाव आजाता है [इसी से कहा है कि जैव रूप करके प्रविष्ट होगया है]। चैतन्यं यदधिष्ठानं लिङ्गदेहश्च यः पुनः। चिच्छाया लिङ्गदेहस्था तत्संघो जीव उच्यते ॥११॥ लिङ्ग देह की कल्पना का आधार जो कि अधिष्ठान चैतन्य है एक तो वह, दूसरे उस में कल्पित जो कि लिङ्गदेह है, तीसरे उस लिङ्गदेह में जो चिदाभास पड़ा हुआ है, इन तीनों का संघ ही 'जीव' कहा जाता है। माहेश्वरी तु माया या तस्या निर्माणशक्तिवत्। विद्यते मोहशक्तिश्च तं जीवं मोहयत्यसौ ॥१२॥