पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 129, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वैतविवेकप्रकरणम् १११ से जब कि तुम जीवन्मुक्ति जैसे पद का त्याग कर रहे हो, तब क्या तुम स्वर्ग सुख के लोभ में फँसकर विदेहमुक्ति को छोड़ नहीं बैठोगे ? यों बार बार तुम्हारा जन्म होता ही रहेगा। क्योंकि तुम तो स्वर्ग मात्र से ही सन्तुष्ट होने वाले प्राणी ठहरे। जो तुम ऐहिक भोगों का लालच भी नहीं छोड़ सकते हो उस तुम्हें मुक्ति का ढोंग छोड़ देना चाहिये । क्षयातिशयदोषेण स्वर्गो हेयो यदा तदा। स्वयं दोषतमात्मायं कामादिः किं न हीयते ॥५३॥ "क्षय की अधिकतारूपी दोष से [अथवा नाश और दूसरे की अधिकता की ईर्षा से] हम स्वर्ग का परित्याग करते हैं" ऐसा यदि कहो तो बताओ फिर सकल पुरुषार्थों के विघातक इस दोषरूप कामादि को ही क्यों नहीं छोड़ देते हो ? [दोषी स्वर्ग को छोड़ने वाले को अत्यन्त दोषी कामादि तो छोड़ ही देने चाहियें ।] तत्त्वं बुद्ध्वापि कामादीन्निःशेषं न जहासि चेत् । यथेष्टाचरणं ते स्यात् कर्मशास्त्रातिलङ्घिनः ॥५४॥ आत्मतत्व को जानकर भी यदि तू पूर्णरूप से कामादि को नहीं छोड़ेगा तो इस का परिणाम यही होगा कि तत्वज्ञानीपने के अभिमान में आकर तू कर्मशास्त्र [कर्तव्य बताने वाले शास्त्र] की आज्ञाओं को टालने लगेगा और यों तू एक यथेष्टाचारी हो जायगा [सो भाई ! यह भला तत्वज्ञान हुआ यों तो तू संसारियों से भी गया बीता हो जायगा। तीर्थ के कव्वों की तरह तू भी ज्ञान का भांड, या राम राम रटने वाला तोता हो जायगा ।] बुद्धाद्वैतस्वतत्वस्य यथेष्टाचरणं यदि । शुनां तत्त्वदृशां चैव को भेदोऽशुचिभक्षणे ॥५५॥