पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रताप से जब मन में से दृश्य का निवारण हो चुका हो [ जब बोधरूपी झाडू से मनरूपी घर में से दृश्यरूपी कूड़े को बुहार डाला हो] तब यह जान लेना चाहिये कि परा निर्वाण निर्वृति किंवा निरतिशय मोक्ष सुख प्राप्त हो चुका है । विचारितमलं शास्त्रं चिरमुद्ग्राहितं मिथः । सन्त्यक्तवासनान्मौनादृते नास्त्युत्तमं पदम् ॥६५॥ अद्वैत शास्त्र को हमने खूब विचार कर देख लिया है, गुरु शिष्यादि संवाद के द्वारा आपस में बहुत दिनों तक एक दूसरे को समझा देखा है, इतना सब करने पर हम तो इसी निश्चय पर पहुँचे हैं कि वासनारहित मौन से उत्तम कोई पद ही नहीं है [तात्पर्य यह है कि कामादि वासनाओं के निकल जाने से मन में जब तूष्णींभाव किंवा मौनावस्था आ जाती है तब इस दशा से उत्तम दशा कोई भी नहीं है] । विक्षिप्यते कदाचिद्धीः कर्मणा भोगदायिना । पुनः समाहिता सा स्यात् तदैवाभ्यासपाटवात् ॥६६॥ [ वृत्तिरहित हुआ भी चित्त प्रारब्ध कर्मों से जब कभी विक्षिप्त होने लगे तब उस का इलाज बताया जाता है कि ] भोगदायी प्रारब्ध कर्म के बल से यदि कभी बुद्धि विक्षिप्त हो जाती हो तो वह बुद्धि प्रबल अभ्यास के सामर्थ्य से फिर भी समाहित हो जाती है । [इस से साधकों को अभ्यास को बढ़ाना चाहिये ] । विक्षेपो यस्य नास्त्यस्य ब्रह्मवित्वं न मन्यते । ब्रह्मैवायमिति प्राहुर्मुनयः पारदर्शिनः ॥६७॥ जिस को कभी विक्षेप ही नहीं होता है उस को तो ब्रह्मवित्