भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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(जैसे (१) धुला हुआ, (२) मांडी दिया हुआ, (३) चित्रों की रेखा वाला, तथा (४) रंग भरा हुआ—ये चार अवस्थायें छींट के कपड़े की होती हैं, इसी प्रकार परमात्मा में भी पहली चित्, दूसरी अन्तर्यामी, तीसरी सूत्रात्मा, चौथी विराट्, ये चार अवस्थायें होती हैं।) स्वतः शुभ्रोऽत्र धौतः स्याद् घट्टितोऽन्नविलेपनात् । मष्याकारैर्लाञ्छितः स्याद् रञ्जितो वर्णपूरणात् ॥३॥ जो वस्त्र स्वतः [अर्थात् दूसरे द्रव्य से सम्बन्ध हुए बिना] ही शुभ्र है उसको यहाँ ‘धौत’ कहा जाता है। अन्न [अर्थात् मांडी] से पुतने पर उसको ‘घट्टित’ कहते हैं। स्याही से जिस पर [खाली] आकार बना दिये गये हों वह ‘लाञ्छित’ कहाता है। [यथायोग्य] रंग भर देने पर वही ‘रञ्जित’ कहाने लगता है। स्वतश्चिदन्तर्यामी तु मायावी, सूक्ष्मसृष्टितः । सूत्रात्मा, स्थूलसृष्ट्यैव विराडित्युच्यते परः ॥४॥ वह परमात्मा जब स्वतः हो [जब उसमें माया और माया के कार्यों का मिश्रण न हुआ हो] तब ‘चित्’ कहाता है। माया का योग हो जाने पर वही परात्मा ‘अन्तर्यामी’ हो जाता है। जब उसका सूक्ष्म सृष्टि से योग हो जाता है [किंवा जब उसे अपंचीकृत भूतों से बना हुआ समष्टि सूक्ष्म शरीर मिल जाता है] तब वही ‘सूत्रात्मा’ कहा जाता है। स्थूल सृष्टि [किंवा पंचीकृत भूतों के बने हुए समष्टि स्थूल शरीर] के कारण वही परमात्मा अन्त में ‘विराट्’ कहाने लगता है। ब्रह्माद्याः स्तम्बपर्यन्ताः प्राणिनोऽत्र जडा अपि । उत्तमाधमभावेन वर्तन्ते पटचित्रवत् ॥५॥