भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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चित्रदीपप्रकरणम् १३५ यद्यपि अनुभव से ही तत्व का निश्चय होता है । परन्तु “अनुभव किया हुआ पदार्थ हो भी सकता है या नहीं” यह संभावना जब करनी हो तब तो तर्क को मानना ही पड़ेगा ऐसा यदि कहा जाय तो हम कहेंगे कि अनुभव के अनुसार ही तर्क का वर्णन करना चाहिये । अनुभव के विरोधी तर्कों का करना ठीक नहीं है । स्वानुभूति रविद्याया मावृतौ च प्रदर्शिता । अतः कूटस्थचैतन्य मविरोधीति तर्क्यताम् ॥३१॥ अविद्या तथा आवरण के विषय के अनुभव का प्रदर्शन हमने इसी प्रकरण के 'अज्ञानी विदुषा पृष्टः' इस २७वें श्लोक में किया है । इससे ऐसी तर्कणा करनी चाहिये कि वह कूटस्थ चैतन्य आवृत्ति का तो विरोधी ही नहीं है । [जैसे सूरज अपना आवरण करनेवाले मेघमण्डल का भी विरोधी नहीं है, इसी प्रकार कूटस्थतत्व आवरण का भी विरोधी नहीं है किन्तु वह तो उस आवरण को भी जतलाता रहता है ।] तच्चेद्विरोधि, केनेयमावृतिर्ह्यनुभूयताम् । विवेकस्तु विरोध्यस्यास्तत्वज्ञानिनि दृश्यताम् ॥२॥ [वह तर्क ऐसा होना चाहिये ] यदि वह कूटस्थ चैतन्य इस अविद्या नाम के आवरण का विरोधी है तो इस आवरण को कौन अनुभव करता है उसे बताओ ? [कूटस्थ चैतन्य इसका विरोधी नहीं है ] इस अविद्या का विरोधी तो विवेक ही है यह बात तत्व- ज्ञानी पुरुष में स्पष्ट ही देख लो कि उसके विवेक ने अविद्या को मार डाला है । [जो चैतन्य अविद्या के आवरण को सिद्ध किया करता है, वही यदि उसका विरोधी भी हो, तब तो अविद्या की