पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 155, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंचित्रदीपप्रकरणम् १३७
आरोपितस्य दृष्टान्ते रूप्यं नाम यथा तथा। कूटस्थाध्यस्तविक्षेपनामाहमिति निश्चयः ॥३६॥ शुक्तिरजत के दृष्टान्त में जैसे आरोपित पदार्थ का नाम 'रूप्य' होता है इसी प्रकार कूटस्थ में कल्पित जो विक्षेप [चिदाभास] है उसका ही नाम 'अहम्' होता है। इदमंशं स्वतः पश्यन् रूप्यमित्यभिमन्यते । तथा स्वं च स्वतः पश्यन्नहमित्यभिमन्यते ॥३७॥ 'इदं' भाग को स्वतः [आंखों से] देखता हुआ भी जैसे झूठ मूठ ही यह अभिमान कर लेता है कि यह तो 'रूप्य' है, इसी प्रकार अपने आपको स्वतः देखकर भी वृथा ही 'मैं' ऐसा अभिमान कर बैठता है। [जब हम अपने आप को देखते हों तब हमको 'अहं' आदि कोई भी शब्द बोलने की आवश्यकता नहीं होती है तो भी यह जीव 'मैं' कह ही बैठता है] इदन्त्वरूप्यते भिन्ने स्वत्वाहन्ते तथेष्यताम् । सामान्यं च विशेषश्च ह्युभयत्रापि 'गम्यते ॥३८॥ इदन्ता तथा रूप्यता जैसे भिन्न भिन्न हैं, इसी प्रकार स्वत्व और अहन्ता भी भिन्न भिन्न ही हैं। परन्तु इन दोनों [दृष्टान्त तथा दार्ष्टान्तिक] में ही सामान्यविशेषभाव तो समानं ही है। शंका यह है कि स्वयं और अहं शब्द एकार्थक हैं, फिर दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिक में समता कैसे होगी ? इसका उत्तर यह दिया गया कि—इदं और और रूप्य शब्दार्थों में तथा स्वयं और अहं शब्दार्थों में सामान्य विशेष भाव तो समान ही है। उसी समता को लेकर यह दृष्टान्त दिया गया है। ९