पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 178, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें१६० पञ्चदशी के कारण, यह नियामक हो सकता है। ईश्वर को यदि निया- मक न मानें तो बन्धामोक्ष की कोई व्यवस्था ही इस लोक में न रहेगी। [फिर इस व्यवस्था को कौन करेगा ?] भीषास्मादित्येवमादा वसङ्गस्य परात्मनः । श्रुतं तद्युक्तमप्यस्य क्लेशकर्माद्यसंगमात् ॥१०७॥ भीषास्माद्वातः पवते [ तै० २-८ ] इत्यादि श्रुतियों में इस असंग परमात्मा को नियन्ता बताया गया है। उसमें जीवों में पाये जाने वाले क्लेशादि के न होने से उसकी नियामकता युक्तिसंगत भी है। जीवानाम्प्यसङ्गत्वात् क्लेशादिर्न ह्यथापि च । विवेकाग्रहः क्लेशकर्मादि प्रागुदीरितम् ॥१०८॥ असङ्ग होने के कारण यद्यपि जीव भी क्लेशादि से रहित ही हैं परन्तु विवेकाग्रह [ प्रकृति और पुरुष के भेद को न समझने ] के कारण इन जीवों को क्लेशादि होते हैं, यह बात हम पहले कह चुके हैं। नित्यज्ञानप्रयत्नेच्छा गुणानीशस्य मन्वते । असङ्गस्य नियन्तृत्व मयुक्तमिति तार्किकाः ॥१०९॥ तार्किक लोग तो असंग आत्मा के नियामकपने को सहन ही नहीं करते इससे उन्होंने तो जीवों से विलक्षण रखने के लिये ईश्वर में नित्य ज्ञान, नित्य प्रयत्न तथा नित्य इच्छा को माना है। पुंविशेषत्वमप्यस्य गुणैरेव न चान्यथा । सत्यकामः सत्यसंकल्प इत्यादि श्रुतिर्जगौ ॥११०॥ [गुणों ही के कारण उसको पुरुष विशेष मान लिया है। जीवों के इच्छा आदि गुण अनित्य हैं। ईश्वर के इच्छा आदि