भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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१८० पञ्चदशी हण' करना [चढ़ना] कहा जाता है। उसके पश्चात् विहित और प्रतिषिद्ध बातों में प्रवृत्त हो जाना ही 'भ्रमण' किंवा घूमना कहाता है। विज्ञानमयरूपेण तत्प्रवृत्तिस्वरूपतः । खशक्त्येशो विक्रियते मायया भ्रामणं हि तत् ॥१७४॥ अपनी ही शक्ति से प्रभावित होकर वह ईश्वरतत्व विज्ञान- मय रूप होकर तथा उसकी प्रवृत्ति रूप बनकर विकृत हुआ करता है। गीता के उपर्युक्त श्लोक में इसी को 'माया से जीवों का भ्रामण, अर्थात् घुमाना कहा जाता है। अन्तर्यमयतीत्युक्त्याऽयमेवार्थः श्रुतौ श्रुतः । पृथिव्यादिषु सर्वत्र न्यायोऽयं योज्यतां धिया ॥१७५॥ यही बात यः पृथिव्यां तिष्ठन् यः पृथिवीमन्तरो यमयति [बृ० ३-७-३] इस श्रुति में कही गयी है। अन्य सब पदार्थों में भी यही न्याय अपनी बुद्धि से लगा लेना चाहिये। जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्ति— जानाम्यधर्मं न च मे निवृत्तिः । केनापि देवेन हृदि स्थितेन यथा नियुक्तोऽस्मि तथा करोमि ॥१७६॥ मैं धर्म को खूब पहचानता हूँ, परन्तु धर्म म मेरी प्रवृत्ति ही नहीं होती। मैं अधर्म को भी भले प्रकार जानता हूँ, परन्तु मैं उससे बच भी नहीं रहा हूँ। असली बात तो यह है कि कोई देवता मेरे हृदय में मेरा हृदयेश्वर बना बैठा है। वह जैसे जैसे मुझे आज्ञा देता रहता है मैं वैसा वैसा करता रहता हूँ