पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१८४ पञ्चदशी अपने में छिपे हुए चित्रों को प्रकट कर देता है [बनाता नहीं] इसी प्रकार यह ईश्वर अपने में विलीन हुए सम्पूर्ण जगत् को प्राणियों के कर्मों के अनुसार, आविर्भूत कर दिया करता है। पुनस्तिरोभावयति स्वात्मन्येवाखिलं जगत् । प्राणिकर्मक्षयवशात् संकोचितपटो यथा ॥१८४॥ जिस प्रकार लपेटा हुआ कपड़ा, अपने चित्रों को छिपा लेता है, इसी प्रकार जब प्राणियों के भोगदायी कर्म क्षीण होजाते हैं तब फिर यही ईश्वर अपने आपे में ही इस सम्पूर्ण जगत् को छिपा बैठता है। रात्रिद्यसौ सुप्तिबोधा वुन्मीलननिमीलने । तूष्णींभावमनोराज्ये इव सृष्टिलयाविमौ ॥१८५॥ ये सृष्टि तथा प्रलय तो ठीक ऐसे ही हैं जैसे कि दिन और रात, स्वप्न तथा जागरण, उन्मेष और निमेष, चुपचाप रहना और मनोराज्य करना होता है। [ये काम जीव के हैं तथा सृष्टि प्रलय आदि ईश्वर के काम हैं।] आविर्भावतिरोभावशक्तिमत्वेन हेतुना । आरम्भपरिणामादिचोद्यानां नात्र संभवः ॥१८६॥ आविर्भाव और तिरोभाव दोनों ही शक्तियों वाला होने के कारण, आरम्भवाद और परिणामवाद आदि की तो संभावना ही नहीं है। अद्वितीय पदार्थ आरम्भक नहीं हो सकता तथा निरवयव का परिणाम होना भी सम्भव नहीं है। केवल विवर्त- वाद ही एक निष्कण्टक मार्ग है। अचेतनानां हेतुः स्याज्जाड्यांश नेश्वरस्तथा । चिदाभासांशतस्त्वेष जीवानां कारणं भवेत् ॥१८७॥