पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१८६ पञ्चदशी सुरेश्वर ने ही नहीं श्रुति ने भी तो कहा है कि सत्य ज्ञान तथा अनन्त जो ब्रह्म है उससे आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथिवी, ओषधि, अन्न, तथा देह उत्पन्न हो गये हैं [श्रुति ने भी सुरेश्वरा- चार्य की तरह ही ईश्वर और ब्रह्म तत्व का अन्योन्याध्यास मानकर ही यह बात कही है।] आपातदृष्टितस्तत्र ब्रह्मणो भाति हेतुता । हेतोश्च सत्यता तस्मादन्योन्याध्यास इष्यते ॥१९२॥ इस श्रुति में बताया हुआ, सत्य आदि लक्षणोंवाला, निर्गुण ब्रह्म, आपातदृष्टि से [अधिक गम्भीर विचार न करें तो] जगत् का कारण प्रतीत होता है और यों जगत् को बनाने वाला जो मायाधीन चिदाभास है, वही आपातदृष्टि से सत्य प्रतीत होता है। ये दोनों ही बातें [प्रतीतियें] अन्योन्याध्यास के बिना कैसे बनें ? इसी से इस श्रुति को देखकर अन्योन्याध्यास का होना हमने माना है। अन्योन्याध्यासरूपोसावन्नलिप्तपटो यथा । घट्टितेनैकतामेति तद्वद् भ्रान्त्यैकतां गतः ॥१९३॥ मांडी लगाया हुआ कपड़ा जैसे कूटने पीटने घोटने मांजने से एक [गफ़] हो जाता है, इसी प्रकार अन्योन्याध्यासरूप यह ईश्वर केवल भ्रान्ति के ही कारण एकभाव को प्राप्त हो गया है [वैसे तो ब्रह्म और माया के अधीन चिदाभास पृथक् पृथक् ही हैं]। मेघाकाशमहाकाशौ विविच्येते न पामरैः । तद्वद् ब्रह्मेशयोरैक्यं पश्यन्त्यापातदर्शिनः ॥१९४॥ पामर [थोड़ी बुद्धिवाले] लोग जैसे मेघाकाश और महा-