पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१९४ पञ्चदशी बुरा व्यवहार कराता है । यों ईश्वरतत्व प्राणियों का भागी बन कर रहता है। वह उनसे भिन्न कोई तटस्थ शासक कदापि नहीं है । ज्ञात्वा सदा तत्वनिष्ठा ननु मोदामहे वयम् । अनुशोचाम एवान्यान्न भ्रान्ते र्विवदामहे ॥२१५॥ उस अद्वितीय ब्रह्मतत्व को जब से हम पहचान गये हैं, तभी से तत्वनिष्ठ होकर हम तो बड़े ही प्रसन्न रहने लगे हैं । जिन मन्द भागियों को इस तत्व का ज्ञान नहीं हुआ है उन पर तो हमें केवल थोड़ा सा शोक ही होता है । भ्रान्ति में फँसकर हम उनके साथ विवाद करना पसन्द नहीं करते हैं । तृणार्चकादियोगान्ता ईश्वरे भ्रान्तिमाश्रिताः । लोकायतादिसांख्यान्ता जीवे विभ्रान्तिमाश्रिताः॥२१६॥ तृणपूजकों से लेकर योग पर्यन्त वादियों को 'ईश्वरतत्व' के विषय में भ्रान्ति हो रही है । लोकायत से लेकर सांख्य पर्यन्त वादियों को 'जीव' के विषय में बड़ा भ्रम हो रहा है । अद्वितीयब्रह्मतत्वं न जानन्ति यदा तदा । भ्रान्ता एवाखिलास्तेषां क्व मुक्तिः क्वेह वा सुखम् ॥२१७॥ जो अद्वितीय ब्रह्मतत्व को नहीं जानते हैं वे तो सभी भ्रान्त हैं । उनको मर जाने पर न तो विदेहमुक्ति ही मिलती है और न इस लोक में ही वे सुख पा सकते हैं । तत्वज्ञान न होने से इन्हें मुक्ति नहीं मिलेगी तथा वैराग्य- सम्पन्न होने के कारण इस लोक के सुखों से भी ये लोग स्वयं ही परहेज कर बैठेंगे । यों ये दोनों सुखों से वंचित होजायंगे । उत्तमाधमभावश्चेत् तेषां स्यादस्तु तेन किम् । स्वप्नस्वराज्यभिक्षाभ्यां न बुद्धः स्पृश्यते खलु ॥२१८॥