पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 222, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें२०२ पञ्चदशी यदद्वैतं श्रुतं सृष्टेः प्राक्, तदेवाद्य, चोपरि। मुक्तावपि, वृथा माया भ्रामयत्यखिलान् जनान् ॥२३८॥ सदेव सोम्येदमग्र आसीत् (छा० ६-२-१) इस श्रुति में सृष्टि की उत्पत्ति से पहले जिस अद्वैत ब्रह्मतत्व का प्रतिपादन किया गया है, वही अद्वैत तत्व तीनों कालों में रहता है—वही आज भी मौजूद है और भविष्यत् में मुक्ति हो जाने पर भी वही बना रहेगा [इतना होने पर भी सभी को जो भेद का पक्षपात हो रहा है उसका कारण तो यह है कि] इस माया ने इन लोगों को वृथा ही भरमा रक्खा है [तत्व ज्ञान से हीन होने के कारण इन लोगों को ऐसा अभिनिवेश हो गया है।] ये वदन्तीत्थमेतेपि भ्राम्यन्ते विद्ययात्र किम् ? न यथापूर्वमेतेषामत्र भ्रान्ते रदर्शनात् ॥२३९॥ प्रपंच को मायामय और तत्व को अद्वितीय जो लोग बताते हैं, वे भी तो [अविद्या के वश में आकर] भरमाये फिर ही रहे हैं—[वे भी तो संसार में फँसे ही देखे जाते हैं] ऐसी कोरी विद्या किंवा ऐसे कोरे तत्वज्ञान का फिर हम क्या करें? ऐसी शंका करने वाले से कहो कि इन लोगों को यहाँ पहले जैसी भ्रान्ति नहीं रह गयी है [प्रारब्ध कर्म के वश से वे लोग व्यव- हार में फँसे भी रहें परन्तु इनको पहले जैसा अभिनिवेश (आग्रह आसक्ति] नहीं होता है क्योंकि बन्धन मन की चीज है, वह ज्ञानी का टूट जाता है। अद्वैत तत्व भावप्रधान है। क्रियाओं को देख कर तत्वज्ञानी का निश्चय नहीं हो सकता। क्रिया तो ज्ञानी और अज्ञानी दोनों एक ही जैसी करते हैं। भेद इतना है कि ज्ञानी नाटक के पात्रों की तरह अपने हिस्से आया काम कर जाता