पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२१४ पंचदशी और अज्ञानी में केवल 'ग्रन्थि' और 'ग्रन्थि भेद' का ही अन्तर (फर्क) होता है] । व्रात्यश्रोत्रिययो र्वेदपाठापाठकृता भिदा । नाहारादावस्ति भेदः सोयं न्यायोऽत्र योज्यताम् ॥२६८॥ देखते नहीं हो कि—'व्रात्य' तथा 'श्रोत्रिय' में केवल वेद- पाठ कर सकने और न कर सकने का ही तो अन्तर होता है । उनके खान पान में कोई भी भेद नहीं होता । इसी न्याय को यहाँ भी लगा लेना चाहिये । न द्वेष्टि संप्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति । उदासीनवदासीन इति ग्रन्थिभिदोच्यते ॥२६९॥ ज्ञानी की ग्रन्थि नहीं रहती यह बात गीता ने भी कही है—ऊपर आ पड़े दुःखों में द्वेष नहीं करता, जाते हुए सुखों से ठहरने को नहीं कहता । केवल उदासीन की तरह से रहने लगता है । बस इसी को तो 'ग्रन्थि-भेद' कहते हैं । औदासीन्यं विधेयं चेद् वच्छब्दव्यर्थता तदा । न शक्ता अस्य देहाद्या इति चेद् रोग एव सः ॥२७०॥ ग्रन्थिभेद का वर्णन करने वाले इस गीतावाक्य में यदि उदासीनता का विधान माना जायगा [कि उसे उदासीन की तरह रहने लगना चाहिये । दुनियाँ के काम छोड़कर भाग जाना चाहिये] तो उदासीनवदासीनः (गीता १४-२३) इस वाक्य में वत् शब्द का प्रयोग ही निष्प्रयोजन होगा । ['वत्'शब्द का अभि- प्राय यह है कि उदासीन (बेगारी) जैसे काम करते हैं उसके फल से जैसे उन्हें कुछ भी मतलब नहीं होता इस तरह से रहने लगे। फलासक्ति को छोड़ दे। अन्दर से त्याग और बाहर से संग हो यही