भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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६ पंचदशी

एक सर्वाधिक प्रेम आत्मविषय में सभी का देखा जाता है। ऐसी अवस्था में 'मुझको धिक्कार है' ऐसा जो एक द्वेष कभी कभी आत्मा के विषय में पाया जाता है वह तो दुःख के सम्बन्ध के कारण से दूसरी तरह से भी सिद्ध हो जाता है। इस कारण यह द्वेष आत्मा की प्रेम-पात्रता को हटाने में असमर्थ रह जाता है। क्योंकि यह प्रेम तो आत्मविषय में सब के अनुभव से सिद्ध हो रहा है। तत्प्रेमात्मार्थमन्यत्र नैवमन्यार्थमात्मनि । अतस्तत् परमं तेन परमानन्दतात्मनः ॥९॥ वह प्रेम अपने लिए तो दूसरों से भी कर लिया जाता है, परन्तु दूसरों के लिए अपने आपे से प्रेम करने की बात ठीक नहीं जँचती। इस कारण आत्मप्रेम ही परमप्रेम है। इसीसे आत्मा की परमानन्दता सिद्ध हो जाती है। अपने से भिन्न पुत्र आदि में भी जब प्रेम दीख पड़ता हो तब धोखे में आकर उसको स्वाभाविक प्रेम नहीं मान बैठना चाहिये। क्योंकि वह प्रेम पुत्रादियों में आत्मार्थ ही होता है। उनमें स्वाभा- विक प्रेम किसी को नहीं होता। इसके विपरीत लोगों को जो आत्मा में प्रेम होता है वह प्रेम किसी दूसरे के लिए नहीं होता। किन्तु वह अपने लिये ही होता है। यों निरुपाधिक [अथवा निर्व्याज] होने के कारण यह आत्म-प्रेम ही परम [अर्थात् निर- तिशय] प्रेम कहाता है। इससे यह सिद्ध हो जाता है कि निर- तिशय प्रेम का आस्पद होने से, आत्मा ही परमानन्द स्वरूप [किंवा निरतिशय सुखरूप] है। इत्थं सच्चित्परानन्द आत्मा युक्त्या, तथाविधम् । परं ब्रह्म, तयोरैक्यं श्रुत्यन्तेषूपदिश्यते ॥१०॥