पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२३० पञ्चदशी जब बड़े मेलों में घुसते हैं तब -अपने शरीरों पर कोई चिन्ह करके नहीं घुसते। अपने शरीर के अपने होने में उन्हें कभी सन्देह नहीं होता ] ठीक इसी प्रकार प्रत्यगात्मा के विषय में ऐसा ही दृढ़ ज्ञान, मुक्ति को पाने के लिये आवश्यक है। इसी बात का निर्णय करने के लिये श्रुति में 'अयम्' यह पद कहा है। देहात्मज्ञानवज्ज्ञानं देहात्मज्ञानबाधकम्। आत्मन्येव भवेद्यस्य स नेच्छन्नपि मुच्यते ॥२०॥ 'मैं मनुष्य हूँ' ऐसा जो देहात्मविषय में लोगों का दृढ़ निश्चय पाया जाता है, उसके समान ही यदि किसी को प्रत्यगात्मा के विषय में, देहात्मज्ञान की बाधा करने वाला ज्ञान हो जाय [कि यही आत्मतत्व मैं हूँ। यही ब्रह्मतत्व मैं हूँ] वह विद्वान् मुक्त होना न चाहने पर भी मुक्त हो जाता है [क्योंकि उसका संसार का कारण अज्ञान तो ज्ञान से बाधित हो चुका है ] अयमित्यपरोक्षत्व-मुच्यते चेत्तदुच्यताम् । स्वयंप्रकाशचैतन्यमपरोक्षं सदा यतः ॥२१॥ 'अयम्' का अर्थ लोक में 'अपरोक्षत्व' होता है। सो इस श्रुति में भी 'अयं' इस शब्द से अपरोक्षता ही लिया गया है, ऐसा यदि कोई कहे तो उसकी बात भी मान लो कि हाँ यह अर्थ भी लिया जा सकता है। क्योंकि स्वयंप्रकाश [अर्थात् किसी साधनान्तर की सहायता के बिना प्रतीत होने वाला] चैतन्य तो सदा ही प्रत्यक्ष रहता है [यह हमारा सिद्धान्त ही है] परोक्षमपरोक्षं च ज्ञानमज्ञानमित्यदः । नित्यापरोक्षरूपेऽपि द्वयं स्याद् दशमे यथा ॥२२॥