पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 252, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें२३२ पञ्चदशी नद्यां ममार दशम इति शोचन् प्ररोदिति । अज्ञानकृतविक्षेपं रोदनादिं विदुर्बुधाः ॥२५॥ अब वह दसवां मनुष्य शोक करता और रोता है कि हाय ! दसवां तो नदी में डूब मरा । बुद्धिमान् लोग इस रोदन आदि को अज्ञान का किया हुआ विक्षेप समझते हैं । न मृतो दशमोऽस्तीति श्रुत्वाप्तवचनं तदा । परोक्षत्वेन दशमं वेत्ति स्वर्गादिलोकवत् ॥२६॥ जब कोई आप्त पुरुष आकर कहता है कि—भाई दसवां मरा नहीं, वह तो यहीं है, तब इस आप्त वचन को सुनकर परोक्षरूप से दसवें को जान जाता है । जैसे शास्त्र के कहने से स्वर्गादिलोक को परोक्षरूप से जान लिया जाता है । त्वमेव दशमोऽसीति गणयित्वा प्रदर्शितः । अपरोक्षतया ज्ञात्वा हृष्यत्येव न रोदिति ॥२७॥ उस आप्त पुरुष ने, नौ को गिनने के बाद उससे कह दिया [बता दिया] कि 'दसवां तो तू ही है' बस अब तो उसने अपरोक्ष- रूप से अपने आपको जान लिया कि ओहो ! दसवां तो मैं ही हूँ। अब तो वह परमहृष्ट होता है, अब वह पहले की तरह रोता नहीं है। अज्ञानावृतिविक्षेपद्विविधज्ञानतृप्तयः । शोकापगम इत्येते योजनीयाश्चिदात्मनि ॥२८॥ (१) अज्ञान (२) आवरण (३) विक्षेप (४) परोक्षज्ञान (५) अपरोक्ष ज्ञान (६) तृप्ति तथा (७) शोकनाश ये सातों अवस्थायें जो दृष्टान्तभूत दसवें में दिखाई गयी हैं, दार्ष्टान्तिक चिदात्मा में भी लगा लेनी चाहियें ।