पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 254, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें२६४ पञ्चदशी जानता है कि मैं तो कूटस्थ ही हूँ । यही उसकी अपरोक्षज्ञान नाम की पांचवीं अवस्था कहाती है । कर्ता भोक्तेत्येवमादिशोकजातं प्रमुञ्चति । कृतं कृत्यं प्रापणीयं प्राप्तमित्येव तुष्यति ॥३२॥ [कूटस्थ असङ्ग आत्मा का ज्ञान जब हो जाता है तब] कर्ता भोक्ता आदि जितने भी शोक हैं उन सब को छोड़ देता है। [यही शोकापगम नाम की छठी अवस्था कहाती है] । जो कुछ करना था सो कर लिया, जो कुछ पाना था सो पा लिया, ऐसा समझ कर वह संतुष्ट हो जाता है । [यही उसकी तृप्ति नाम की सातवीं अवस्था कहाती है] । अज्ञान मावृति स्तद्वद् विक्षेपश्च परोक्षधीः । अपरोक्षमत्तिः शोकमोक्ष स्तृप्ति निरंकुशा ॥३३॥ अज्ञान, आवरण, विक्षेप, परोक्षज्ञान, अपरोक्षज्ञान, शोक- राहित्य और निरङ्कुश तृप्ति [यों ये सातों अवस्थाएं इस दाष्ट्रान्तिक में भी होती हैं]। सप्तावस्था इमाःसन्ति चिदाभासस्य तास्वसौ । बन्धमोक्षौ स्थितौ, तत्र तिस्त्रो बन्धकृतः स्मृताः॥३४॥ ये सातों अवस्थाएं चिदाभास की ही हैं। [कूटस्थ की नहीं] ये बन्ध और मोक्ष इन सातों अवस्थाओं में ही समा जाते हैं। इन सातों में पहली तीन [अज्ञान आवरण तथा विक्षेप] अवस्थाएं बन्ध करने वाली हैं। [पिछली चार मोक्ष की अवस्थाएं हैं] । न जानामीत्युदासीनव्यवहारस्य कारणम् । विचारप्रागभावेन युक्तमज्ञानमीरितम् ॥३५॥