भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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पृष्ठ 260

२४० पंचदशी परोक्षज्ञान के समय भी वह ब्रह्म स्वयंप्रकाश ही रहता है] क्यों कि तब [परोक्षज्ञान के समय] उसे यही ज्ञान तो होता है कि स्वयंप्रकाश ब्रह्म नाम की वस्तु इस संसार में है। अहं ब्रह्मेत्यनुल्लिख्य ब्रह्मास्तीत्येवमुल्लिखत् । परोक्षज्ञानमेतन्न भ्रान्तं वाधानिरूपणात् ॥५१॥ परोक्षज्ञान में केवल इतनी ही कमी तो है कि वह साधक के हृदय में 'मैं ब्रह्म हूँ' इस महावार्ता को [अनुभव के अक्षरों में] लिख नहीं देता है। वह तो उसे केवल यही बताता है कि ब्रह्म नाम का कोई पदार्थ है। सो भाई ! यह परोक्षज्ञान भ्रान्त ज्ञान नहीं है क्योंकि इस [परोक्षज्ञान] की बाधा का निरूपण तो हो ही नहीं सकता। [इस परोक्षज्ञान को अधूरा ज्ञान तो कह सकते हैं, भ्रान्त नहीं कह सकते] ब्रह्म नास्तीति मानं चेत् स्याद् वाध्येत तदा ध्रुवम् । न चैवं प्रबलं मानं पश्यामोऽतो न बाध्यते ॥५२॥ [परोक्षज्ञान की बाधा नहीं होती, इसी को स्पष्ट करके दिखाया जाता है कि] यदि कोई ऐसा प्रमाण मिल जाता जो यह सिद्ध कर देता कि 'ब्रह्म नहीं है' तब तो निश्चय ही इस परोक्षज्ञान की भी बाधा हो जाती। परन्तु ऐसा प्रबल प्रमाण तो हमें मिलता ही नहीं। इससे [हम तो यही कहते हैं कि] इस परोक्षज्ञान की बाधा नहीं होती है। व्यक्त्यनुल्लेखमात्रेण भ्रमत्वे स्वर्गधीरपि । भ्रान्तिः स्याद्व्यक्त्यनुल्लेखात् सामान्योल्लेखदर्शनात् ॥ परोक्षज्ञान से ब्रह्मव्यक्ति का उल्लेख नहीं होता है, केवल इतने से कारण से यदि परोक्षज्ञान को भ्रान्तज्ञान माना जायगा