पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 263, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंइस वाक्य से अपने में दशमत्व का साक्षात्कार हो गया था। [भाव यह है कि—केवल वाक्यश्रवण से तो परोक्षज्ञान ही हुआ करता है। परन्तु जब उस परोक्षज्ञान के साथ विचार भी मिल जाता है और विचार तथा अनुभव दोनों एक ही बात कहने लगते हैं, तब साक्षात्कार किंवा अपरोक्षज्ञान हो जाता है।] दशमः क इति प्रश्ने त्वमेवेति निराकृते । गणयित्वा स्वेन सह स्वमेव दशमं स्मरेत् ॥५९॥ [जिस दसवें के होने को तुम कह रहे हो कि 'दसवां है'] वह दसवां कौन सा है ? वह प्रश्न जब किया जाता है और जब कि उसका उत्तर यह दिया जाता है, कि 'दसवें तुम्ही हो' तब वह अपने साथ शेष नौ को गिन कर पीछे से अपने को ही दसवां मान लेता है [कि ओहो ! दसवां तो मैं ही हूँ। यों यह देख लो कि विचार सहित वाक्य से अपरोक्ष ज्ञान उत्पन्न हो जाता है]। दशमोसीति वाक्योत्था न धीरस्य विहन्यते । आदिमध्यावसानेषु न नवस्वस्य संशयः ॥६०॥ इस दसवें पुरुष को 'तू ही दसवां है' इस वाक्य से जो अपने दशवेंपन का ज्ञान उत्पन्न.हो जाता है कि 'मैं ही दसवां हूँ' उस बुद्धि का फिर कभी विघात नहीं होता [किसी ज्ञान से उस बुद्धि की बाधा नहीं होती]। फिर तो उसे उन नौ के आदि, मध्य या अवसान में कहीं भी गणना करने पर दसवें के विषय में संशय कभी (जीवनपर्यन्त) नहीं होता कि 'मैं दसवां हूँ या नहीं?