पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 265, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृप्तिदीपप्रकरणम् २४५ विचार किया, तब वह व्यक्ति अर्थात् प्रत्यगात्मा रूपी ब्रह्म को देख पाया। [यों तैत्तिरीय श्रुति के पर्यालोचन से यह बात सिद्ध होती है कि—पहले तो वाक्य से परोक्ष ज्ञान ही उत्पन्न हुआ करता है। फिर जब उस वाक्य के साथ विचार मिल जाता है,तब वाक्य से अपरोक्ष ज्ञान की उत्पत्ति हो जाती है]। यद्यपि त्वमसीत्यत्र वाक्यं नोचे भृगोः पिता । तथाप्यन्नं प्राणमिति विचार्य स्थलमुक्तवान् ॥६४॥ इस प्रकरण में यद्यपि भृगु के पिता ने 'तू ही ब्रह्म है' ऐसा कोई उपदेश वाक्य तो नहीं कहा है, तो भी अन्न, प्राण आदि का विचार करने के बाद, आत्मसाक्षात्कार के उत्पादक विचार के योग्य स्थल को तो दिखला ही दिया है। अन्नप्राणादिकोशेषु सुविचार्य पुनः पुनः। आनन्दव्यक्तिमीक्षित्वा ब्रह्मलक्ष्माप्ययूयुजत् ॥६५॥ अन्न प्राण आदि पांचों कोशों में बार बार सुविचार करके आनन्द नाम के आत्मा को साक्षात् देख कर पीछे से आनन्दाद्धयेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते । आनन्देन जातानि जीवन्ति आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्ति । (तै० ३-६) ब्रह्म के इस लक्षण को भी प्रत्यगात्मा में ही लगा दिया है। [इस कारण यह न कहना चाहिए कि—अन्नमयादि कोशों का विचार करने पर तो प्रत्य- गात्मा का साक्षात्कार हो सकता है। ब्रह्म का साक्षात्कार उससे कैसे होगा ? क्योंकि प्रत्यगात्मा ही तो ब्रह्म है। क्योंकि ब्रह्म के सब लक्षण उसमें मिलते हैं। यों उससे भिन्न ब्रह्म नाम का कोई भी पदार्थ नहीं है]।