भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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२५० पञ्चदशी इत्थमन्योन्यतादात्म्यप्रतिपत्तिर्यदा भवेत् । अब्रह्मत्वं त्वमर्थस्य व्यावर्तते तदैव हि ॥७७॥ तदर्थस्य च पारोक्ष्यम्, यद्येवं किं ततः शृणु । पूर्णानन्दैकरूपेण प्रत्यग्बोधोऽवतिष्ठते ॥७८॥ जब किसी को इस प्रकार [व्यतिहार से—लौट फेर से] तादात्म्य का ज्ञान हो जायगा,तब एक तो यह होगा कि त्वमर्थ में जो अब्रह्मता आ गई थी [भ्रान्ति से उसको जो अब्रह्म समझ लिया गया था] वह तुरन्त ही भाग जायगी । दूसरे यह होगा कि तदर्थ में जो परोक्षता आ गई थी [वह जो परोक्ष ज्ञान का ही विषय हो गया था] वह भी उसी क्षण नष्ट हो जायगी । ऐसा होने पर भी क्या होगा ? सो इस प्रश्न का उत्तर भी सुन लो, कि—यह जो अभी तक प्रत्यग्बोध ही था यही अब पूर्णानन्द बन बैठता है । एवं सति महावाक्यात् परोक्षज्ञानमीर्यते । यैस्तेषां शास्त्रसिद्धान्तविज्ञानं शोभतेतराम् ॥७९॥ इतना सब सुन चुकने पर भी जो लोग यह कहते ही जाते हैं कि महावाक्य से परोक्षज्ञान ही होता है, [वे सिद्धान्त के रहस्य को जानते ही नहीं] सिद्धान्त-ज्ञानरहित उनकी बात सुन कर हमें तो हँसी आती है । आस्तां शास्त्रस्य सिद्धान्तो युक्त्या वाक्यात् परोक्षधीः । स्वर्गादिवाक्यवन्नैवं दशमे व्यभिचारतः ॥८०॥ शास्त्र के सिद्धान्त की बात को छोड़ दो [उससे हमें कुछ मतलब नहीं] युक्ति से यही सिद्ध होता है कि—वाक्य से तो-