भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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है [इसी को 'अतत्' को 'तत्' समझ लेना भी कहा जाता है] जैसे कि पिता आदि हितैषियों को शत्रु समझ लिया जाता है तो इसको भी विपरीत भावना ही कहते हैं । आत्मा देहादिभिन्नोयं मिथ्या चेदं जगत् तयोः । देहाद्यात्मत्वसत्यत्वधी र्विपर्ययभावना ।।१११।। यह आत्मा वस्तुतः देहादियों से भिन्न ही है और यह जगत् भी मिथ्या ही है । ऐसा होने पर भी आत्मा को तो देहादि रूप मान लेना, तथा जगत् को सत्य समझ लेना, यही इस प्रकरण की 'विपरीत भावना' है । तत्त्वभावनया नश्येत् सातो देहातिरिक्तताम् । आत्मनो भावयेत् तद्वन्मिथ्यात्वं जगतोऽनिशम्।।११२।। [देहादि की आत्मता और जगत् की सत्यता बुद्धि वाली] वह विपरीत भावना, तत्व भावना से [या यों समझना चाहिये कि आत्मा तो देहादि से भिन्न है तथा यह जगत् मिथ्या है ऐसा निरन्तर ध्यान करते रहने से ] नष्ट हो जाती है । इस कारण आत्मा की देहादि से भिन्नता तथा देहादि जगत् के मिथ्यापन की भावना सदा ही किया करे । किं मन्त्रजपवन्मूर्तिध्यानवद् वात्मभेदधीः । जगन्मिथ्यात्वधीश्चात्र व्यावत्र्या स्यादुतान्यथा ।।११३।। आत्मा के देहादि से भिन्न होने के ज्ञान को, तथा जगत् के मिथ्या होने के विचार को, मन्त्र के जप की तरह, या देवता के ध्यानादि की तरह नियम से करें ? या लौकिक कामों की तरह नियम के बिना भी कर सकते हैं ? यह एक साधन मार्ग का प्रश्न है।