भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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प्रणाम हे अच्युत ! हे अनन्त ! आपको मेरा अनन्त वार प्रणाम हो । अब तो मेरी एकमात्र यही अभिलाषा रह गयी है कि आप को प्रणाम करना मेरे स्वभाव में प्रविष्ट हो जाय । मेरे सम्पूर्ण कर्म आप के लिये किये गये प्रणामों के रूप हो जांय । दिन रात के मेरे इक्कीस हज़ार छ सौ श्वास आप को किये गये प्रणामों का रूप धारण करलें। मेरे नेत्रों के निमे- षोन्मेष आपके प्रणामों की माला बन जांय । मेरे मन के संकल्प विकल्पों पर आप को प्रणाम करने की ही एकमात्र धुन सवार हो जाय । मेरी नाडियों के स्पन्दन की गुंजार में आप को ही प्रणाम करने की रट सुनाई पड़ने लग जाय । कहां तक कहता जाऊं ? यह सभी जगत् आप को प्रणाम करता हुआ स्पष्ट दीखने लग पड़े । ऐसा यदि हो जाय तो हे अच्युत ! हे अनन्त ! मेरे जीवन की पहेली ही हल हो जाय । मेरे जीवन की यह पहेली जिस दिन हल हो चुकेगी—जीवन को सर्वव्यापक अनुभव करना जिस दिन मुझे आ जायगा—सर्वव्यापक जीवन को शरीरमात्र में बन्दी बनाये रखने वाली 'मैं' की रूई को जिस दिन मुझे ज्ञान की आग में सुलगा कर राख बना देना आ जायगा— उस दिन 'मैं' आप अनन्त के अनन्तत्व में प्रवेश करने का दिव्य अधिकार पाकर अपने आप को 'मैं' कहने के झूठे अधिकार से सदा के लिए वंचित हो कर धन्य हो जाऊँगा । ओह ! ऐसा शुभ दिन कब आएगा ? हे अच्युत ! हे अनन्त ! अब तो मैं उसी दिन को देख लेने की आशा से ही अपने इस जीवनरथ को आगे चलाना चाहता हूँ ।