भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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तृप्तिदीपप्रकरणम् २८५ फलों को भोगा करे, उससे जगत् के मिथ्या होने के विचार को चोट नहीं लगती [ अथवा उनको मिथ्या समझ लेने से प्रारब्ध भोग में कुछ भी रुकावट नहीं पड़ती ] । निर्बन्धस्तत्त्वविद्याया इन्द्रजालत्वसंस्मृतौ । प्रारब्धस्याग्रहो भोगे जीवस्य सुखदुःखयोः ॥१७५॥ तत्त्वविद्या का निर्बन्ध अथवा उद्देश्य तो बस इतना ही है कि—इस जगत् को इन्द्रजाल के समान मिथ्या समझ लिया जाय [ भोगों का अपलाप करना उसका उद्देश्य कदापि नहीं है ] प्रारब्ध का आग्रह भी केवल इतना ही है कि जीव को सुख या दुःख पहुँचा दिये जांय। भोगों को सत्य सिद्ध करने में उसका आग्रह कदापि नहीं है [ यों प्रारब्ध और ज्ञान दोनों ही भिन्न विषय वाले हैं ] । विद्यारब्धे विरुध्येते न भिन्नविषयत्वतः । ज्ञानद्भिरप्यैन्द्रजालविनोदो दृश्यते खलु ॥१७६॥ ऊपर वर्णित रीति से भिन्न विषयवाले होने के कारण, ज्ञान और प्रारब्ध में आपस में विरोध नहीं होता। लोक में भी देखते हैं कि—जो लोग इन्द्रजाल को इन्द्रजाल जान लेते हैं, वे भी इन्द्रजाल के चमत्कारों को तो देखा ही करते हैं [ इस दृष्टान्त से जान पड़ता है कि ज्ञान और प्रारब्ध भोग में कोई लड़ाई नहीं है ] । जगत्सत्यत्वमापाद्य प्रारब्धं भोजयेद् यदि । तदा विरोधि विद्याया, भोगमात्रान्न सत्यता ॥१७७॥ यदि तो प्रारब्ध कर्म, इस जगत् को सत्य बनाकर ही, जीव को सुख दुःख दिया करता होता, तो [ अवश्य ही ] यह विद्या