पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२१८ पञ्चदशी पहचान लेता है, तब फिर उस पुरुष को जाग्रदादि सभी अव- स्थाओं में साक्षी तत्व के असंगपने का निश्चय हो जाता है। यत्र यद् दृश्यते द्रष्ट्रा जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु । तत्रैव तन्नेतरत्रेत्यनुभूतिर्हि संमता ॥२११॥ यह द्रष्टा, जाग्रत् स्वप्न और सुषुप्ति में क्रम से जिन [स्थूल सूक्ष्म और आनन्द नाम के] भोग्यों को अनुभव किया करता है, वे भोग्य पदार्थ केवल उन ही अवस्थाओं में हुआ करते हैं। [दूसरी अवस्थाओं के आजाने पर वे भोग्य पदार्थ नहीं रहते] परन्तु इन तीनों अवस्थाओं में अनुगत रहने वाला जो इनका द्रष्टा है, वह तो इन सब से पृथक् ही है यह अनुभव तो सभी को सम्मत है। स यत्तत्रेक्षते किंचित्तेनानन्वागतो भवेत् । दृष्ट्वैव पुण्यं पापं चेत्येवं श्रुतिषु डिण्डिमः ॥२१२॥ ‘स यत्तत्र किंचित् पश्यति अनन्वागतस्तेन भवति, असंगोह्ययं पुरुषः सवाएष एतस्मिन् संप्रसादे रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं पापं च पुनः प्रति- न्यायं प्रतियोन्याद्रवति’ (वृ० ४-३-१५) इस श्रुति में डंके की चोट कहा गया है कि—वह आत्मा उस अवस्था में, जिस किसी भी भोग्य को देखता है, उसके साथ अनुगत नहीं होता—किंवा उससे सम्बद्ध नहीं हो जाता [किन्तु वह वहां के दृश्यों को वहीं छोड़ कर, अकेला ही दूसरी अवस्था में पहुँचता है। वह वहां के पुण्य पाप किंवा सुख दुःखों को देखकर ही चला जाता है। उन्हें अपने साथ नहीं ले जाता।] जाग्रत्स्वप्नसुषुप्त्यादि प्रपंचं यत् प्रकाशते । तद् ब्रह्माहमिति ज्ञात्वा सर्वबन्धैः प्रमुच्यते ॥२१३॥