भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 331, कुल 726 में से

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तृप्तिदीपप्रकरणम् ५११ पर चाहे संसार की अनुवृत्ति होती भी रहो तो भी जीवन्मुक्ति को पुरुषार्थ मानना ही पड़ेगा] व्रताभावाद् यदाध्यासस्तदा भूयो विविच्यताम् । रससेवी दिने भुङ्क्ते भूयो भूयो यथा तथा ॥२४९॥ [पहले २४६ श्लोक में कह चुके हैं कि] यह कोई व्रत नहीं है, इस कारण जब जब अध्यास हो जाता हो, तब तब बार बार विचार करना चाहिये । जिस प्रकार रससेवी पुरुष एक ही दिन में, जब जब उसे भूख लगती है तब तब, बार बार खाता है [इसी प्रकार अध्यास की निवृत्ति के लिए बारम्बार विवेक करना चाहिये ।] शमयत्यौषधेनायं दशमः स्वं व्रणं यथा । भोगेन शमयित्वैतत् प्रारब्धं मुच्यते तथा ॥२५०॥ जिस प्रकार वह दसवां पुरुष अपने व्रण को औषध से अच्छा कर लेता है, इसी प्रकार भोग के द्वारा इस प्रारब्ध (कर्म) को शान्त करके ही मुक्त होता है [प्रारब्ध कर्मों का फल ज्ञान से नहीं हटता । उसे तो भोग ही नष्ट कर सकते हैं।] किमिच्छन्निति वाक्योक्तः शोकमोक्ष उदीरितः । आभासस्य ह्यवस्थैषा षष्ठी, तृप्तिस्तु सप्तमी ॥२५१॥ शोकमोक्षरूपी जिस अवस्था को 'किमिच्छन् कस्य कामाय' (बृ ४-४-१२) इस वाक्य में कहा है, चिदाभास की उस छठी अवस्था का वर्णन यहाँ तक किया जा चुका। अब 'तृप्ति' नाम की सातवीं अवस्था का व्याख्यान किया जायगा । साङ्कुशा विषयैस्तृप्तिरियं तृप्तिर्निरङ्कुशा । कृतं कृत्यं प्रापणीयं प्राप्त मित्येव तृप्यति ॥२५२॥

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