पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 344, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें३२४ पञ्चदशी जो महाबलशाली, पाशुपत अस्त्र से बिंध कर भी नहीं मरा था, वह बिना नोक के बाणों से ही मर जायगा इसमें क्या प्रमाण है ? आदावविद्यया चित्रैः स्वकार्यै र्जृम्भमाणया । युद्द्वा बोधोऽजयत् सोऽद्य सुदृढो बाध्यतां कथम्॥२८१॥ जब ब्रह्मविद्या का अभ्यास प्रारम्भ किया था, अपने नाना- विध कार्यों की फौज को लेकर चढ़ाई करने वाली जिस अविद्या से झगड़ कर बोध ने उसे तभी जीत लिया था, वही महाबलशाली बोध [ जो अभ्यास की पटुता से आज तो बहुत ही दृढ़ हो चुका है ] क्योंकर बाधा जायगा ? तिष्ठन्त्वज्ञानतत्कार्यशवा बोधेन मारिताः । न भीति र्बोधसम्राजः कीर्तिः प्रत्युत् तस्य तैः॥२८२॥ अज्ञान और अज्ञान के बच्चे, जिनको कि बोध ने मार डाला है भले ही पड़े रहें, बोध रूपी सम्राट् को उन से कुछ भी ख़तरा नहीं होता। प्रत्युत उनसे तो उसकी कीर्ति ही होती है [कि देखो ये अज्ञान और उसके बच्चे बोध के मारे हुए सामने पड़े हैं।] य एवमतिशूरेण बोधेन न वियुज्यते । प्रवृत्त्या वा निवृत्या वा देहादिगतयास्य किम् ॥२८३॥ जो पुरुष इस तरह के अतिशूर बोध से कभी भी [ एक क्षण के लिये भी ] वियुक्त नहीं होता है, देहादि की प्रवृत्ति या निवृत्ति से उस महात्मा का कुछ इष्ट या अनिष्ट नहीं हो सकता है । प्रवृत्तावाग्रहो न्याय्यो बोधहीनस्य सर्वथा । स्वर्गाय वापवर्गाय यतितव्यं यतो नृभिः ॥२८४॥