भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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पृष्ठ 354

१३४ पञ्चदशी चिदाभासरहित बुद्धि से व्याप्त हो रहा हो उसे कोई भी 'ज्ञात कुम्भ' नहीं मान सकता। ज्ञातत्वं नाम कुम्भेऽतश्चिदाभासफलोदयः । न फलं ब्रह्मचैतन्यं मानात् प्रागपि सत्वतः ॥१०॥ [क्योंकि केवल बुद्धि तो ज्ञातता को उत्पन्न करही नहीं सकती] इस कारण कुम्भ में चिदाभासरूपी फल का उदय हो जाना ही 'ज्ञातता' कहाती है । ब्रह्मचैतन्य को ही फल मान लें और [चिदाभास को हटादें] यह भी ठीक नहीं है [ क्योंकि ब्रह्मचैतन्य को तो फल अर्थात् घटादिका स्फुरण कह ही नहीं सकते इसका कारण यह है कि ] ब्रह्म चैतन्य तो प्रमाणों से भी पहले से विद्यमान रहता है । [प्रमाणों का फल तो उसे कहना चाहिये जो प्रमाणों के पीछे से होता हो] बात यह है कि जिसे अनुभव या स्फूर्ति या प्रतीति कहते हैं, वह तो अजर अमर अखण्ड और एकरस है। वह अनादि काल से ऐसी ही है, और ऐसी ही रहेगी। परन्तु हम विचारदरिद्र लोगों को इस अखण्ड अनन्त सदातन स्फूर्ति का ध्यान बिल्कुल भी नहीं है। अब यह होता है कि जब किसी पदार्थ में ज्ञातता नाम का धर्म उत्पन्न हो जाता है, त्यों हीं हम उस पदार्थ की स्फूर्ति होना मान लेते हैं। असलमें देखा जाय तो वहां जो स्फूर्ति है वह तो सदातन ब्रह्म चैतन्य ही है। ज्ञातता उत्पन्न होने के कारण जो पदार्थ उस अखण्ड स्फूर्ति के लपेटे में आगया है वह भी प्रतीत सा होने लग पड़ा है। तत्व विचार से मालूम होता है कि यह प्रतीति प्रमाणों से पैदा नहीं होती । प्रमाणों से तो पदार्थों