पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३३६ पञ्चदशी धीवृत्त्याभासकुम्भानां समूहो भास्यते चिता । कुम्भमात्रफलत्वात् स एक आभासतः स्फुरेत् ॥१४॥ ब्रह्मचैतन्य से तो धीवृत्ति, चिदाभास तथा कुम्भ ये सब के सब ही प्रकाशित होते हैं। चिदाभास बिचारा तो केवल कुम्भ में ही रहने वाला एक फल है । इस कारण उस चिदा- भास से तो वह अकेला घट ही घट भास सकता है । यों ब्रह्मचैतन्य का तथा चिदाभास का विषयभेद भी है । चैतन्यं द्विगुणं कुम्भे ज्ञातत्वेन स्फुरत्यतः । अन्येऽनुव्यवसायाख्य माहुरेतद् यथोदितम् ॥१५॥ क्योंकि एक घट, चिदाभास और ब्रह्मचैतन्य दोनों से ही भास्य होता है, इस कारण घट में ज्ञातता उत्पन्न होजाने पर तो दुगना चैतन्य होजाता है । दूसरे तार्किक लोग तो ऊपर बताये हुए इसी को अनुव्यवसाय नाम का दूसरा ज्ञान कह देते हैं। घटोऽयमित्यसावुक्ति राभासस्य प्रसादतः । विज्ञातो घट इत्युक्ति र्ब्रह्मानुग्रहतो भवेत् ॥१६॥ जब हम कहते हैं कि 'यह घट है' तब यह कहना चिदा- भास की सहायता से होता है। जब हम कहते हैं कि 'घट को जान लिया' तब यह कथन ब्रह्म के अनुग्रह से हुआ करता है । [यों व्यवहार के भेद से भी चिदाभास और ब्रह्म का भेद जान लेना चाहिये] आभासब्रह्मणी देहाद् बहिर्यद्वद् विवेचिते । तद्वदाभासकूटस्थौ विविच्येतां वपुष्यपि ॥१७॥ देह से बाहर जैसे चिदाभास और ब्रह्मका विवेक यहां