पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 371, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंकूटस्थदीपप्रकरणम् ३५१ नहीं ? यह बात अपने अपने अनुभवों से ही पूछो । जो माया सबकी कल्पना करने में समर्थ है उसके लिये दुर्घट बात कुछ भी नहीं है । [उस माया ने ही उन दोनों मायिकों को चिद्रूप से प्रकाशित भी कर डाला है ।] असन्निद्रापि जीवेशौ चेतनौ खमृगौ सृजेत् । महामाया सृजत्येतावित्याश्चर्यं किमत्र ते ॥६३॥ हम तो देखते हैं कि—हमारी नींद भी—[जिसे हमारी माया भी कह सकते हैं] सुपने के चेतन 'जीव' और 'ईश्वर' को उत्पन्न कर ही लेती है । फिर महामाया चेतन जीवेश्वरों को उत्पन्न करले, इसमें तुम्हें आश्चर्य क्यों होता है ? सर्वज्ञत्वादिकं चेशे कल्पयित्वा प्रदर्शयेत् । धर्मिणं कल्पयेद् यास्याः को भारो धर्मकल्पने ॥६४॥ यह भी उस महामाया का स्वभाव ही है कि—उसने ईश्वर में सर्वज्ञत्वादि धर्मों की कल्पना कर दिखलाई है—[उसे जीव की तरह असर्वज्ञ नहीं रक्खा है] भला जिस माया ने धर्मी की कल्पना कर डाली है, उसे धर्म की कल्पना करने में कौन सी कठिनाई हो सकती है ? कूटस्थेऽप्यतिशङ्का स्यादिति चेन्मातिशङ्क्यताम् । कूटस्थमायिकत्वे तु प्रमाणं न हि विद्यते ॥६५॥ जीव और ईश्वर की तरह कूटस्थ को मायिक मानना ठीक नहीं है । क्योंकि कूटस्थ के मायिक होने का कोई भी प्रमाण नहीं मिलता । वस्तुत्वं घोपयन्त्यस्य.वेदान्ताः सकला अपि । सपत्नरूपं वस्त्वन्यन्न सहन्तेऽत्र किंचन ॥६६॥