भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 385, कुल 726 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 385

ध्यानदीपप्रकरणम् ३६३ सकृदाप्तोपदेशेन परोक्षज्ञान मुद्भवत् । विष्णुमूर्त्युपदेशो हि न मीमांसामपेक्षते ॥२५॥ आप्त पुरुष के एक बार के उपदेश से ही परोक्ष ज्ञान हो जाता है। लोक में भी देखलो कि विष्णुमूर्तिका उपदेश बहस और तर्क की अपेक्षा नहीं करता [जिसको उससे ज्ञान होना होता है उस पहली बार के उपदेश से ही हो जाता है । ] कर्मोपास्ती विचार्येते अनुष्ठेयाविनिर्णयात् । बहुशाखाविप्रकीर्णं निर्णोतुं कः प्रभुर्नरः ॥२६॥ अनुष्ठान करने योग्य कर्म तथा उपासनाओं में सन्देह हो सकता है, इससे उनका विचार किया जाता है। क्योंकि अनेक शाखाओं में जहां तहां प्रतिपादित किये हुए कर्म को कोई भी पुरुष सहसा निर्णय नहीं कर सकता । निर्णीतोऽर्थः कल्पसूत्रै ग्रथित स्तावतास्तिकः । विचारमन्तरेणापि शक्तोऽनुष्ठातुमञ्जसा ॥२७॥ जैमिनि आदि पूर्वाचार्यों ने जिस अर्थ का निश्चय कर दिया है, उसी अर्थ [कर्म पद्धति] को कल्प सूत्रों ने संग्रह कर लिया है। आस्तिक पुरुष तो बस इतने ही से सन्तुष्ट हो जाता है और विचार किये बिना भी कर्म को भले प्रकार कर सकता है । उपास्तीनामनुष्ठानमार्षग्रन्थेषु वर्णितम् । विचाराक्षममर्त्याश्च तच्छ्रुत्वोपासते गुरोः ॥२८॥ उपासनाओं की रीति भी आर्ष ग्रन्थों में कही गयी है । जो पुरुष स्वयं विचार नहीं कर सकते, वे कल्पों में कही हुई उपासनाओं को गुरुमुख से सुनकर करने लगते हैं ।

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित) · पृष्ठ 385, कुल 726 में से · BharatKosha