पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 387, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंध्यानदीपप्रकरणम् ३६५ हो सकती है जब अपरोक्ष ज्ञान हो जाय [ अपरोक्ष ज्ञान करादेने के अतिरिक्त विचार का कोई भी काम नहीं है ] । विचारयन्नामरणं नैवात्मानं लभेत चेत् । जन्मान्तरे लभेतैव प्रतिबन्धक्षये सति ॥३३॥ मरण पर्यन्त विचार करते रहने पर भी यदि किसी को आत्मा का साक्षात्कार न हो गया हो तो,प्रतिबन्धों के हट जाने पर, दूसरे किसी जन्म में तो उसे साक्षात्कार हो ही जायगा । इह वामुत्र वा विद्येत्येवं सूत्रकृतोदितम् । शृण्वन्तोऽप्यत्र बहवो यन्न विद्युिरिति श्रुतिः ॥३४॥ ऐहिकमप्यप्रस्तुतप्रतिबन्धे तद्दर्शनात् (ब्रह्म सू० ३-४-५१)इस सूत्र में व्यास देव ने कहा है कि विचार करने वाले को इस जन्म या दूसरे जन्मों में ब्रह्म ज्ञान हो जाता है । 'शृण्वन्तोऽप्यत्र बहवो यन्न विद्युः' ( क० २-७ ) इस श्रुति में कहा गया है कि प्रतिबन्ध होने पर बहुतों को इस जन्म में ज्ञान नहीं होता । गर्भ एव शयानः सन् वामदेवोऽवबुद्धवान् । पूर्वाभ्यस्तविचारेण यद्वदध्ययनादिषु ॥३५॥ 'गर्भे नु सन्नन्वेषा मवेदमहं देवानां जनिमानि विश्वा ( ऐतरेय ४- ५ ) इस श्रुति में कहा गया है कि—वामदेव को गर्भवास के दिनों में ही अपरोक्ष ज्ञान हो गया था । इससे यह सिद्ध होता है कि इस जन्म में श्रवणादि कर लेने वाले को दूसरे जन्म में ३४—कोई प्रतिबन्ध न हो तो श्रवण आदि से इस जन्म में भी ज्ञान हो जाता है । प्रतिबन्ध हो तो इस जन्म में न होकर दूसरे जन्मों में होता है । प्रतिबन्ध के साधक प्रमाण देखे जाते हैं । जैसे कि वामदेव को गर्भ में ज्ञान हुआ था । बहुत से तो इस तत्व को सुन कर भी नहीं समझते हैं ।