भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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नाटकदीपप्रकरणम् परमात्माद्वयानन्दपूर्णः पूर्वं स्वमायया । स्वयमेव जगद् भूत्वा प्राविशज्जीवरूपतः ॥१॥ सृष्टि से पहले वह परमात्मा परमानन्द से परिपूर्ण था, वह अपनी माया शक्ति से अपने आप ही जगद्रूप हो गया और फिर वही जीवरूप से उसी में प्रवेश कर बैठा । विष्ण्वाद्युत्तमदेहेषु प्रविष्टो देवता भवेत् । मर्त्याद्यधमदेहेषु स्थितो भजति मर्त्यताम् ॥२॥ वह परमात्मा जब विष्णु आदि उत्तम देहों में प्रविष्ट हुआ तब देवता बन गया । वह जब मर्त्य आदि अधम देहों में घुसा तब मर्त्यभाव को प्राप्त हो गया । [भाव यह है कि यह दीखने वाला उत्तमाधम भाव स्वाभाविक नहीं है । किन्तु शरीर रूपी उपाधि के कारण से है । ऐसी अवस्था में जब एक ही परमात्मा सब शरीरों में प्रविष्ट हुआ है तब फिर पूज्यपूजक भाव या उत्तमाधम भाव क्यों है ? इस प्रश्न का समाधान हो जाता है । ] अनेकजन्मभजनात्-स्वविचारं चिकीर्षति । विचारेण विनष्टायां मायायां शिष्यते स्वयम् ॥३॥ अनेक जन्मों के भजन से [अनेक जन्मों में किये हुए कर्मों को ब्रह्म में समर्पण करने से ] यह प्राणी आत्मविचार करना