पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४१६ पञ्चदशी रूप स्थिति को, श्रवणादि के द्वारा उपार्जन कर लेता है ऐसा जानने वाला पुरुष फिर उसी समय भयरहित मोक्षरूपी अद्वि- तीय ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है । फिर आगे 'यदा ह्येवैष एतस्मि- न्नुदरमन्तरं कुरुतेऽथ तस्य भयं भवति ( तै० २-७ ) इस श्रुति में कहा गया है कि जब तो वही मुमुक्षु उसी प्रत्यगभिन्न ब्रह्म में थोड़ा सा भी [ उपास्य उपासक आदि रूपी ] भेद करता या देखने लगता है तब तुरन्त ही उस भेददर्शी को भय अर्थात् संसार प्रयुक्त दुःख होने लगता है । वायुः सूर्यो वह्निरिन्द्रो मृत्यु र्जन्मान्तरेन्तरम् । कृत्वा धर्मं विजानन्तोऽप्यस्माद् भीत्या चरन्ति हि ॥४॥ भीषास्माद्वातः पवते (तै० २-८) इसमें कहा गया है कि[जगत् के नियामक कहाने वाले] वायु, सूर्य, अग्नि, इन्द्र तथा मृत्यु ये पांचों देवता पिछले जन्मों में अपने धर्म को जानते हुए भी केवल अन्तर कर लेने [ किंवा प्रत्यगात्मा और ब्रह्म तत्व का भेद समझ लेने ] के कारण अब उसी ब्रह्म के भय से [इन वायु आदि जन्मों में ] अपने अपने कामों में ही सदा लगे रहते हैं [ जैसे कि डण्डे के डर से तेली का बैल अपने चक्कर पर घूमता रहता हो । ] आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्न बिभेति कुतश्चन । एतमेव तपेन्नैषा चिन्ता कर्माग्निसंभृता ॥५॥ ब्रह्मतत्व के आनन्द को समझ चुकने वाला पुरुष फिर किसी बात से भय नहीं करता। कर्मरूपी अग्नि की चिन्ता बस केवल इस ज्ञानी को ही नहीं तपाती [ शेष तो सब प्राणी इसी कर्तव्याग्नि की ज्वालाओं से झुलसते और जलते भुनते रहते हैं]