भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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४१८ पञ्चदशी उस चिन्ता से होने वाला ताप भी उसे कैसे होगा ? यह विद्वान् पुरुष देहादि की प्रवृत्ति से उत्पन्न होने वाले पुण्य-पाप कर्मों को आत्मरूप ही देखता है । यों आत्मा से अभिन्न हो जाने के कारण पुण्य-पाप कर्म उसके तापक नहीं रहते । भिद्यते हृदयग्रन्थि श्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे ॥७॥ उस परावर के देख लिये जाने पर इसकी हृदयग्रन्थि खुल जाती है, सब सन्देह मिट जाते हैं और सभी कर्म नष्ट होजाते हैं। 'पर' भी हिरण्यगर्भ आदि का पद जिसके सामने 'अवर' अर्थात् निकृष्ट जंचने लगता है, उस 'परावर' परमात्मा का साक्षात्कार जब किसी को होजाता है तब उस साक्षात्कारी की अन्योन्याध्यासरूपी हृदय-ग्रन्थि—जिसमें बुद्धि और चिदा- त्मा दोनों ही रस्सी की गांठ की तरह हिलमिल रहे हैं—विदीर्ण हो जाती है । फिर तो आत्मा देहादि से भिन्न है या नहीं ? भिन्न होने पर भी कर्तृत्व आदि धर्म वाला है या नहीं ? अकर्ता होने पर भी ब्रह्म से भिन्न है या नहीं ? अभेद होने पर भी उसके ज्ञान से मुक्ति मिलेगी या नहीं ? इत्यादि सभो संशय टूक टूक हो जाते हैं । फिर इस ज्ञानी के संचित और आगामी कर्म भी नष्ट हो जाते हैं । क्योंकि उनका निदान अज्ञान ही शेष नहीं रहता । तमेव विद्वानत्येति मृत्युं पन्था न चेतरः । ज्ञात्वा देवं पाशहानिः क्षीणैः क्लेशैर्न जन्मभाक् ॥८॥ उसी को जानने वाला जन्म मरण के चक्कर से छूट सकता है, छूटने का दूसरा कोई भी उपाय नहीं है । देव को जानकर