पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 445, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४२३ भूमा का अनुभव हुआ करता है। [समाधि में उस निद्वैत पूर्ण आत्मा का अनुभव विद्वान् को होता है। सुषुप्ति और मूर्छा में उस निद्वैत पूर्ण भूमा का अनुभव सर्वसाधारण को भी हुआ करता है।] सुषुप्ति आदि के समय परिच्छेदक न रहने पर जैसे आत्मा में पूर्णता आ जाती है, इसी प्रकार सृष्टि बनने के पहले भी भेदक के न रहने से वह आत्मा पूर्ण ही रहता है। यो भूमा स सुखं नाल्पे सुखं त्रेधा विभेदिनी । सनत्कुमारः प्राहैवं नारदायातिशोकिने ॥१७॥ ‘यो वै भूमा तत् सुखं नाल्पे सुखमस्ति’ (छा. ७-२४-१) इसमें बताया गया है कि प्रथम कहा हुआ जो ‘भूमा है’ वही सुख किंवा आनन्द है। भूमा और सुख में कोई भी भेद नहीं है। जो अल्प है [जो परिच्छिन्न है, जिसके ज्ञाता ज्ञान ज्ञेय नाम के तीन तीन टूक हो जाते हैं] उसमें तो सुख है ही नहीं। अपनी अवस्था पर अत्यधिक शोक करने वाले नारद को सनत्कु- मार ने यही बात समझायी थी। सपुराणान् पञ्च वेदाञ्शास्त्राणि विविधानि च । ज्ञात्वाप्यनात्मवित्वेन नारदोऽतिशुशोच ह ॥१८॥ चारों वेदों, पुराणों और विविध शास्त्रों को जानकर भी, आत्मज्ञानरहित होने के कारण, नारद को बड़ा ही शोक हो गया था। वेदाभ्यासात् पुरा तापत्रयमात्रेण शोकिता । पश्चाच्चभ्यासविस्मारभङ्गगर्वैश्च शोकिता ॥१९॥ [वेदादि को जानने से तो शोक की निवृत्ति हो जानी चाहिये थी, फिर इन्हें जानकर भी नारद के अतिशोकी होने