भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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पृष्ठ 448

४२६ पञ्चदशी [सिद्धान्ती उत्तर देता है कि] अद्वैत में सुख न सही, परन्तु अद्वैत ही सुख है इस बात का प्रमाण बूझना चाहो तो यह तुम्हारा प्रमाण का प्रश्न ही नहीं बनता । क्योंकि स्वयंप्रकाश वस्तु में तो प्रमाण की आवश्यकता होती ही नहीं । स्वप्रभत्वे भवद्वाक्यं मानं यस्माद् भवानिदम् । अद्वैतमभ्युपेत्यास्मिन् सुखं नास्तीति भाषते ॥२४॥ अद्वैत की स्वप्रकाशता में भी प्रमाण बूझना चाहो तो हम कहेंगे कि उसमें तो तुम्हारा वाक्य ही प्रमाण है । क्योंकि तुम प्रमाणों के बिना ही अद्वैत को मानकर, केवल सुख पर आक्षेप करते हो कि अद्वैत में सुख नहीं है । [इस कारण कहते हैं कि अद्वैत तत्त्व—जिसको तुम 'मैं' कहते हो—स्वयंप्रकाश ही है ।] नाभ्युपैम्यहमद्वैतं त्वद्वचोनूद्य दूषणम् । वच्मीति चेत्तदा ब्रूहि किमासीद् द्वैततः पुरा ॥२५॥ [पूर्वपक्षी कहता है] मैं अद्वैत को मानने वाला नहीं हूँ । किन्तु मैं तो तुम्हारे कथन का अनुवाद करके उस पर दूषण दे रहा हूँ । ऐसी अवस्था में मेरे शब्दों से अद्वैत की सिद्धि करना अनुचित है। इस पर सिद्धान्ती कहता है कि अच्छा तो यह बताओ कि द्वैत से पहले क्या था ? किमद्वैत मुत द्वैत मन्यो वा कोटिरन्तिमः । अप्रसिद्धो, न द्वितीयोऽनुत्पत्तेः, शिष्यतेऽग्रिमः ॥२६॥ बताओ ? द्वैत से पहले अद्वैत था, द्वैत था, या कोई और कोटि थी ? द्वैत और अद्वैत से भिन्न कोई तीसरी कोटि तो प्रसिद्ध ही नहीं है । द्वैत से पहले द्वैत ही हो यह तो ठीक नहीं