भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४२९ [इसके प्राण चल रहे हैं और] निश्चेष्ट पड़ा है जैसे कि मैं सोया करता हूँ । इस पर हम कहेंगे कि बस तब तो मेरे प्रति सुषुप्ति का दृष्टान्त देने वाले तेरी सुषुप्ति ही, तेरे न चाहने पर भी [तेरी इच्छा के विरुद्ध भी] स्वयं प्रकाश सिद्ध हो जाती है । [तभी तो तुम उसका उदाहरण दे रहे हो । नहीं तो बताओ कि अपनी सुप्ति को तुम कैसे जानते हो ?] नेन्द्रियाणि न दृष्टान्तस्तथाप्यङ्गीकरोषि ताम् । इदमेव स्वप्रभत्वं यद् भानं साधनैर्विना ॥३२॥ [तुम्हारे न चाहने पर भी, सुप्ति स्वयंप्रकाश कैसे सिद्ध हो जाती है सो भी देख लो]—सुप्ति को ग्रहण करने वाली इन्द्रियें नहीं होतीं [क्योंकि वे उस समय अपने कारण में विलीन हो जाती हैं] तुम्हारे पास कोई दृष्टान्त भी नहीं है फिर भी तुम उस सुप्ति को मान रहे हो। इसे देखकर यही कहना पड़ता है कि ज्ञान के साधनों के बिना भी प्रकाशित होते रहना यही [सुषुप्ति की] 'स्वयंप्रकाशता' है। स्तामद्वैतस्वप्रभत्वे, वद सुप्तौ सुखं कथम् । शृणु, दुःखं तदा नास्ति ततस्ते शिष्यते सुखम् ॥३३॥ [प्रश्न यह है कि] सुषुप्ति अद्वैत और स्वयंप्रकाश भले ही हो, परन्तु सुषुप्ति में सुख है, यह कैसे मान लें ? इस का उत्तर है कि—उस समय [सुख का विरोध करने वाला] दुःख नहीं रहता, इस कारण सुख ही शेष रह जाता है। [क्योंकि प्रकाश और अन्धकार के समान सुख दुःख भी विरोधी वस्तुएँ हैं। जब दुःख नहीं रहता तब सुख शेष रह ही जाता है। जैसे कि अन्धकार के न रहने पर प्रकाश शेष रह जाता है।]