पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 455, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४३३ [विषय सुख में से निकल कर] परम सुख में डूब जाती है [उस समय जीव की बुद्धि स्वरूप सुख में विलीन हो जाती है। यों निद्रा से पहला सुख विषय सुख है। निद्रा आ जाने पर मिलने वाला सुख स्वरूप सुख है।] जागद्व्यावृत्तिभिः श्रान्तो विश्रम्याथ विरोधिनि । अपनीते स्वस्थचित्तो ऽनुभवेद् विषये सुखम् ॥४३॥ [ऊपर की बात को तीन श्लोकों में विस्तारपूर्वक यों समझो कि] जागते समय जो अनेक व्यापार यह जीव करता है, उनसे थक कर जब मृदुशय्या आदि पर विश्राम लेता है, तब उसके अनन्तर [दुःखदायी व्यापारों से मिलने वाले] विरोधी दुःखों के हटा दिए जाने पर, जब वह स्वस्थचित्त हो जाता है, [जब इसका मन व्याकुल नहीं रह जाता] उसी समय शय्या आदि विषयों से मिलने वाले सुख का साक्षात्कार यह किया करता है। आत्माभिमुखधीवृत्तौ स्वानन्दः प्रतिबिम्बति । अनुभूयैनमत्रापि त्रिपुट्या श्रान्तिमाप्नुयात् ॥४४॥ [विषयों को उपार्जन करता करता तंग हो कर जब उस दुःख को हटाने के लिए कोमल शय्या पर लेट जाता है, तब इस की बुद्धि अन्तर्मुख हो जाती है,] अन्तर्मुख हुई उस बुद्धिवृत्ति में [सामने रखे हुए दर्पण की तरह] स्वरूपभूत जो आनन्द है वह प्रतिबिम्बित हो जाता है। [बस इसी को 'विषयानन्द' कहते हैं] परन्तु इस समय इस विषयानन्द को अनुभव करते हुए भी त्रिपुटी के रहने के कारण जीव को श्रम होता ही है। २९