भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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[Header] ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ५३५

आधार न पाकर, फिर अपने बन्धन स्थान हाथ आदि पर ही लौट आता है ॥४७॥ इसी प्रकार जीव की उपाधि यह मन भी धर्माधर्म के सुख दुःख रूपी फलों को अनुभव करने के लिए, स्वप्न और जाग्रत् में, जहां तहां भ्रमण करके, जब भोगदायी कर्म क्षीण हो जाते हैं तब [अपने उपादान अज्ञान में] विलीन हो जाता है । [उस समय उस मन से उपहित जो 'जीव' है वह 'परमात्मा' ही हो जाता है ] श्येनो वेगेन नीडैकलम्पटः शयितुं व्रजेत् । जीवः सुप्त्यै तथा धावेद् ब्रह्मानन्दैकलम्पटः ॥४९॥ तद्यथास्मिन्नाकाशे श्येनो वा सुपर्णो वा विपरिपत्य श्रान्तः संहृत्य पक्षौ स्वालयायैव म्रियते एवमेवायं पुरुष एतस्मा आनन्दाय धावति यत्र सुप्तो न कंचन कामं कामयते न कंचन स्वप्नं पश्यति' (बृ० ४-३-२२) इस श्रुति में कहा गया है कि जैसे आकाश में सब ओर घूमता हुआ श्येन पक्षी गगन में घूमने की थकावट को हटाने के उद्देश्य से, सोने के लिए केवल मात्र घोंसले की ओर जल्दी जल्दी जाता है, ठीक इसी प्रकार यह जीव भी केवल मात्र ब्रह्मानन्द का लम्पट होकर सुषुप्ति के लिए जल्दी ही हृदयाकाश में पहुँच जाता है । अतिबालः स्तनं पीत्वा मृदुशय्यागतो हसन् । रागद्वेषाद्यनुत्पत्ते रानन्दैकस्वभावभाक् ॥५०॥ महाराजः सार्वभौमः संतृप्तः सर्वभोगतः । मानुषानन्दसीमानं प्राप्यानन्दैकमूर्तिभाक् ॥५१॥ महाविप्रो ब्रह्मवेदी कृतकृत्यत्वलक्षणाम् । विद्यानन्दस्य परमां काष्ठां प्राप्यावतिष्ठते ॥५२॥