भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 462, कुल 726 में से

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१४० पञ्चदशी दोनों ही विलीन हो जाते हैं। [वे अपने विज्ञानमयत्व आदि आकार को छोड़कर कारण रूप में पहुँच जाते हैं। अर्थात् उस समय 'विज्ञानमय' और 'मनोमय' दोनों ही नहीं रहते] उन 'विज्ञानमय' और 'ननोमय' की विलयावस्था 'निद्रा' कहाती है। उसी निद्रा को विद्वान् लोग 'अज्ञान' भी कहते हैं [सोच कर देखलो नींद भी तो अज्ञान ही है] विलीनघृतवत् पश्चात् स्याद् विज्ञानमयो घनः । विलीनावस्थ आनन्दमयशब्देन कथ्यते ॥६३॥ [अग्निसंयोग आदि से] पिघला हुआ घृत, पीछे शीतल- वायु के संयोग से जैसे गाढ़ा हो जाता है, इसी प्रकार [जाग्र- दादि के भोगदायी कर्मों के क्षय हो जाने के कारण] निद्रारूप से विलीन हुआ अन्तःकरण [फिर जब भोगदायी कर्मों के वश से, जागरण अवस्था आती है] विज्ञानरूप से घनका [गाढ़ा] हो जाता है। वह घन विज्ञान ही आत्मा की उपाधि होती है इस कारण आत्मा भी विज्ञानमय हो जाता है। वही जब पहले विलीन अवस्था में था— [जब वह अवस्था उसकी उपाधि बन रही थी] तब उसी को 'आनन्दमय' कहा जाता था। सुप्तिपूर्वक्षणे बुद्धिवृत्तिर्या सुखविम्विता । सैव तद्विम्वसहिता लीनानन्दमयस्ततः ॥६४॥ [ऊपर के श्लोक की बात को अधिक स्पष्ट रीति से यों सम- झना चाहिए कि] सुप्ति से पहले क्षण में जो अन्तर्मुख बुद्धि- वृत्ति होती है उसमें जब सुख का प्रतिबिम्ब पड़ता है उसके बाद उस प्रतिबिम्ब को लिये ही लिये, वही वृत्ति जब निद्रारूप से विलीन हो जाती है तब वही 'आनन्दमय' कहाने लगती है।

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