पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४४२ पञ्चदशी अज्ञान को हटाने में भी तत्पर रहते हैं अर्थात् हमारे साधन की परीक्षा नित्य ही होती रहती है। इस दृष्टि से व्यवहार के साथ साथ साधन करना अधिक लाभदायक प्रतीत होता है। व्यवहार से हट कर आत्मसाधन करने वाले लोग प्रायः करके व्यवहार के झंझट में स्थिर बुद्धि नहीं रह सकते हैं। यों साधन का यह मार्ग बहुत से साधकों को अधूरा रख देता है ऐसा मालूम पड़ता है। माण्डूक्यतापनीयादिश्रुतिष्वेतदतिस्फुटम् । आनन्दमयभोक्तृत्वं ब्रह्मानन्दे च भोग्यता ॥६७॥ माण्डूक्य और तापनीय आदि श्रुतियों में यह बात अत्यन्त ही स्पष्ट है कि 'आनन्दमय' तो भोक्ता है तथा 'ब्रह्मानन्द' भोग्य है । एकीभूतः सुषुप्तस्थः प्रज्ञानघनतां गतः । आनन्दमय आनन्दभुक् चेतोमयवृत्तिभिः ॥६८॥ [सुषुप्तस्थान एकीभूतः प्रज्ञानघन एवानन्दमयो ह्यानन्दभुक् चेतो- मुखः (माण्डूक्य ५) इस माण्डूक्य श्रुति में कहा गया है कि] सुषुप्ति का जो अभिमानी है, वह जब एकीभाव को प्राप्त हो जाता है, उसमें जब प्रज्ञानघनता आजाती है, तब वह आनन्द- मय किंवा आनन्द प्रचुर हो जाता है। वही आनन्दमय, [जिन में चैतन्य की अधिकता रहती है—जो चैतन्य के प्रतिबिम्ब से से युक्त होती हैं] उन अपनी चेतोमय वृत्तियों से आनन्द को भोगा करता है । विज्ञानमयमुख्यैर्यो रूपैर्युक्तः पुराधुना । स लयेनैकतां प्राप्तो बहुतन्दुलपिष्टवत् ॥६९॥ जो आत्मा पहले जागरणकाल में विज्ञानमय आदि