पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविषय करने लगता है] और वायुरहित प्रदेश में रक्खे हुए दीपक के प्रकाश के समान निश्चल हो जाता है, तब कहा जाता है कि 'समाधि' हो गयी । वृत्तयस्तु तदानीमज्ञाता अप्यात्मगोचराः । स्मरणादनुमीयन्ते व्युत्थितस्य समुत्थितात् ॥ ५६ ॥ समाधि से उठे हुए पुरुष को जो स्मरण आता है उससे इस बात का अनुमान किया जाता है कि उस समय वृत्तियां ज्ञात तो नहीं होतीं, परन्तु वे आत्मा को विषय किया करती हैं। समाधि अवस्था में जब कि वृत्तियों की उपलब्धि नहीं होती तब 'वह चित्त ध्येयैकगोचर हो रहा है' ऐसा निश्चय होने का कारण तो यह है कि उस समय की आत्मा को विषय करने वाली वृत्तियां यद्यपि समाधि काल में अज्ञात ही रहती हैं, परन्तु जब वह समाधि से उठता है और उसे स्मरण आता है कि 'मैं इतने समय तक समाधि में डूबा रहा' तब इस स्मरण से उन वृत्तियों का अनुमान हो जाता है । वृत्तीनामनुवृत्तिस्तु प्रयत्नात् प्रथमादपि । अदृष्टासकृदभ्याससंस्कारसचिवाद् भवेत् ॥ ५७ ॥ समाधि के समय वृत्तियों की जो अनुवृत्ति होती रहती हैं, वह योगी के समाधि से पहले किये हुए प्रयत्न से, उस के अदृष्ट से तथा उस के बार-बार के समाधि के अभ्यास के संस्कारों से होती रहती है । यद्यपि समाधि के समय वृत्तियों को पैदा करने के लिये कोई प्रयत्न नहीं किया जाता, फिर भी जो ध्येयैकगोचर वृत्तियों का तांता बंधा रहता है, वृत्तियों का वह तांता, समाधि से पूर्वकाल