पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 472, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें४५० पञ्चदशी श्रुतियुक्त्यनुभूतिभ्यः स्वप्रकाशचिदात्मके । ब्रह्मानन्दे सुप्तिकाले सिद्धे सत्यन्यदा शृणु ॥८९॥ सुप्तिकाले सकले विलीने तमोभिभूतः सुखरूपमेति इत्यादि 'श्रुतियों' से, 'मैं सुख पूर्वक सोया था' इत्यादि परामर्श के और तरह से न हो सकने वाली 'युक्ति' से तथा सुषुप्ति के 'अनुभव' से अब तक यह सिद्ध किया जा चुका है कि सुषुप्ति काल में स्वयंप्रकाश ब्रह्मानन्द रहता है। अब जागरण काल में भी ब्रह्मानन्द को जानने का जो उपाय है उसका वर्णन किया जायगा उसे सुन लो। य आनन्दमयः सुप्तौ स विज्ञानमयात्मताम् । गत्वा स्वप्नं प्रबोधं वा प्राप्नोति स्थानभेदतः ॥९०॥ सुषुप्तिकाल का जो उपरिवर्णित 'आनन्दमय' है, वह जब विज्ञानमयता को पाता है तब फिर स्थानभेद के कारण कर्मानु- सार 'स्वप्न' या 'जागरण' में आता है । नेत्रे जागरणं कण्ठे स्वप्नः सुप्तिर्हृदम्बुजे । आपादमस्तकं देहं व्याप्य जागर्ति चेतनः ॥९१॥ (नेत्र में 'जागरण' रहता है कण्ठ में 'स्वप्न' होता है हृदय कमल में 'सुषुप्ति' होती है ।) यह जीव केवल नेत्र ही नहीं किन्तु पैर से मस्तकपर्यन्त देह को व्याप्त करके जागा करता है । आत्मा का स्वाभाविक स्थान हृदय है परन्तु अहंकार और ममता की प्रेरणा से जब वहां नहीं रहा जाता तब आत्मा का प्रतिबिम्ब विषयभोगलिप्सा के लिये मलिन हो जाता है तब जाग्रत अवस्था में तो नेत्र तथा स्वप्न अवस्था में कण्ठ उस के निवास स्थान बन जाते हैं ।