पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 474, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें४५२ पञ्चदशी न कापि चिन्ता मेऽस्त्यद्य सुखमास इति ब्रुवन्। औदासीन्ये निजानन्दभानं वक्त्यखिलो जनः ॥९५॥ जब कोई मनुष्य यह कहता है कि आज मुझे कुछ भी चिन्ता नहीं है, इस लिये आज मैं सुख पूर्वक बैठा हूँ, तब वह दूसरे शब्दों में यह स्वीकार कर रहा है कि उदासीनता के समय स्वरूपानन्द की स्फूर्ति हुआ करती है [इससे यह जान लेना चाहिय कि जागरण काल में भी आत्मानन्द का भान प्राणियों को होता ही है।] अहमस्मीत्यहंकारसामान्याच्छादितत्वतः। निजानन्दो न मुख्योऽयं, किन्त्वसौ तस्य वासना ॥९६॥ [इस आनन्द को ब्रह्मानन्द न मानकर वासनानन्द ही मानने का कारण भी सुन लो] यह उपर्युक्त आनन्द 'मैं हूँ' ऐसे एक सामान्य [सूक्ष्म] अहंकार से आवृत रहता है [इस आनन्द को भोगते समय अपने 'देवदत्तादिपने' का विचार नहीं रहता किन्तु मैं हूँ ऐसा एक सामान्य (अस्पष्ट) अहंकार बना रहता है] इस कारण यह आनन्द मुख्य आनन्द नहीं है। किन्तु यह तो मुख्यानन्द की वासना है। [इसी से इसको 'वासनानन्द' कहते हैं।] मुख्य आनन्द में मैं हूँ ऐसा अहंकार नहीं रहना चाहिये। नीरपूरितभाण्डस्य बाह्ये शैत्यं न तज्जलम्। किन्तु नीरगुणस्तेन नीरसत्तानुमीयते ॥९७॥ जल से भरा हुआ जो घड़ा है, उसके बाहर की ओर जब स्पर्श करते हैं, तब जो शैत्य प्रतीत होता है, वह शैत्य 'जल' नहीं है [क्योंकि उसमें द्रवपना नहीं पाया जाता।] वह शैत्य