भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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ओम् ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् नन्वेवं वासनानन्दाद् ब्रह्मानन्दादपीतरम् । वेत्तु योगी निजानन्दं मूढस्यात्रास्ति का गतिः ॥१॥ [अब ब्रह्मानन्द के अन्तर्गत 'आत्मानन्द' नाम के द्वितीय अध्याय का आरम्भ किया जाता है] शिष्य ने प्रश्न किया कि— वासनानन्द और ब्रह्मानन्द से भिन्न जो आत्मानन्द है उसको योगी लोग तो [इससे पहले योगानन्द नाम के प्रकरण में कहे अनुसार] जान ही सकेंगे। परन्तु इस आत्मानन्द को वे मूढ लोग—जिनकी गति योग में नहीं—कैसे जानें ? धर्माधर्मवशादेष जायतां म्रियतामपि । पुनः पुनर्देहह्रदैः किं नो दाक्षिण्यतो वद ॥२॥ [गुरु ने उत्तर दिया कि] यह अतिमूढ पुरुष तो [बीते हुए अनन्त कोटि जन्मों में किये हुए] पुण्य पापों के बस में आ आकर अनेक प्रकार की लाखों योनियों में जन्मता और मरता रहेगा ही। हमारी चतुराई से क्या होना है ? [ तात्पर्य यह है कि अति मूढ को तो ब्रह्मविद्या का अधिकार ही नहीं है। उसे जीने मरने दो उसकी चिन्ता मत करो।] अस्ति वोऽनुजिघृक्षुत्वाद्दाक्षिण्येन प्रयोजनम् । तर्हि ब्रूहि स मूढः किं जिज्ञासुर्वा पराङ्मुखः ॥३॥ यदि तुम शिष्य लोग अनुजिघृक्षु हो—शिष्यों का उद्धार करने की यदि तुम्हें इच्छा हो और तुम्हारे दाक्षिण्य से उनका